Monday, December 25, 2017

अपने बयानों के अक्सर विवादों में रहने वाले भाजपा के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर बड़ा ही संगीन आरोप लगाया है। क्या बागी हो चुके हैं BJP नेता सुब्रमण्यम स्वामी, अपनी पार्टी के खिलाफ दिया ये बयान...

अपने बयानों के अक्सर विवादों में रहने वाले भाजपा के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर बड़ा ही संगीन आरोप लगाया है।

भाजपा नेता और राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी उन नेताओं में शुमार हैं जो सच बोलते समय अपनों का भी ख्याल नहीं रखते हैं। स्वामी ने अपनी ही पार्टी बेजीपी पर निशाना साधते हुए सनसनीखेज खुलासा किया है। स्वामी ने केंद्र सरकार पर केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) के अधिकारियों पर बेहतर आर्थिक आंकड़े देने का दबाव बनाने का आरोप लगाया है।

स्वामी का आरोप है कि केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (CSO) ने GDP के जो बेहतरीन आंकड़े जारी किए थे, दरअसल वे मोदी सरकार के दबाव का परिणाम थे। ताकि देश में यह संदेश जाए कि नोटबंदी का अर्थव्यवस्था और जीडीपी विकास दर पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है।

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक यह गंभीर आरोप स्वामी ने शनिवार को गुजरात के अहमदाबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में चार्टर्ड अकाउंटेंट्स को संबोधित करते हुए लगाया। इस दौरान स्वामी ने कहा कि सीएसओ के आला अधिकारियों पर जीडीपी के अच्छे आंकड़े दिखाने का दबाव था।

स्वामी ने कहा, 'आप लोग कृपया करके जीडीपी के तिमाही आंकड़ों पर ना जाएं, ये सब फर्जी हैं। मैं बताया चाहूंगा कि मेरे पिताजी ने सीएसओ की स्थापना की थी।'
ऐसा इसलिए क्योंकि नोटबंदी का अर्थव्यवस्था और जीडीपी पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है, ये आम लोगों को दिखाया जा सके। स्वामी ने खुलकर सीएसओ के आंकड़ों को फर्जी बताया।

इतना ही नहीं सुब्रमण्यम स्वामी में तमिलनाडु के आर के नगर विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी को एक चौथाई नोटा वोट मिलने पर भी सवाल खड़ा किया है। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते बीजेपी की जवाबदेही बनती है।

भले सुब्रमण्यम स्वामी के बयान को राजनीतिक नजरिए से देखा जा रहा हो। बावजूद एक जिम्मेदार व्यक्ति के इन आरोपों पर विपक्ष के नेता जांच करवाए जाने की मांग करने लगे हैं।

भाजपा सांसद ने आगे कहा, 'मैं हाल ही में केंद्रीय मंत्री सदानंद गौड़ा के साथ सीएसओ गया था। गौड़ा ने सीएसओ के अधिकारी को तलब किया। ऐसा इसलिए क्योंकि नोटबंदी के बाद अच्छे आंकड़े पेश करने का दबाव था। इस वजह से ऐसे आंकड़े जारी किए गए ताकि लगे कि नोटबंदी का कोई प्रभाव नहीं हुआ।'

स्वामी यहीं पर नहीं रूके। उन्होंने कहा, मैं बेचैन महसूस कर रहा था। क्योंकि मुझे पता था कि नोटबंदी का प्रभाव तो पड़ा है।' इसके साथ ही स्वामी ने आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट जारी करने की टाइमिंग को लेकर भी सवाल उठाए।

कार्यक्रम में उन्होंने विदेशी रेटिंग एजेंसियों की रिपोर्ट पर भी सवालिया निशान लगाया। उन्होंने कहा, 'आप लोग इन मूडी और फिच की रिपोर्ट्स पर भरोसा नहीं करना। इन्हें तो पैसे देकर किसी भी तरह की रिपोर्ट तैयार करवा सकते हैं।'

Tuesday, December 19, 2017

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Friday, December 1, 2017

आधार को मोबाइल नंबर से लिंक करने का प्रोसेस हुआ ऑनलाइन, इस तरह करे

आज से आपकों मोबाइल नंबर को आधार से लिंक करवाने के लिए रिटेल शॉप के चक्कर नहीं काटने होगे। देश की सभी कंपनियों ने अपनी वेबसाइट पर सर्विस को शुरू कर दिया है। जिसके तहत आप घर बैठे अपने मोबाइल नंबर को आधार से लिंक करवा सकेंगे।

लैपटॉप और डेस्कटॉप के इस्तेमाल से आप मोबाइल को आधार से लिंक कर सकते है। पुराने नंबर को अपडेट करने के लिए पहले आपकों यूआईएडीएआई की वेबसाइट पर जाना होगा। उसके बाद वहां पर आधार अपडेट का आप्शन दिया होगा, उस पर क्लिक करके आपको आधार के सेल्फ सर्विस पोर्टल पर रिडायरेक्ट कर दिया जाएगा। जिसके बाद आपको अपना आधार नंबर देना होगा और कैप्चा कोड डालकर ओटीपी आपके नंबर पर आएगा। इसके बाद आपको मोबाइल नंबर अपडेट फील्ड में जाकर के नया मोबाइल नंबर देना होगा। जिसके बाद आपका नंबर आधार से रजिस्टर होने के बाद पुष्टि हो जाएगी।

इसके साथ ही आपको बता दे कि अगर आपके पास दो अलग-अलग सिम है। तो इसे वेरिफाई करवाने के लिए भी आपको साइट पर जाकर नंबर भरना होगा। फिर आपको ओटीपी डालना होगा। इसके बाद वेबसाइट पर एक कनसेंट मैसेज आएगा, जिसके बाद आपको अपना आधार नंबर डालना है। आधार नंबर देने के बाद कंपनी यूआईएडीएआई को ओटीपी भेजने के लिए गुजारिश करेगा। यूआईएडीएआई फिर उस आधार नंबर पर रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर ओटीपी को भेजेगा। इसके बाद मोबाइल उपभोक्ताओं को उनकी ई-केवाईसी डिटेल दिखाई जाएगीं और ओटीपी को सबमिट करने के लिए कहा जाएगा। फिर आपका नंबर वैरिफाइ हो जाएगा।

Tuesday, November 28, 2017

गुजरात चुनाव बीजेपी के लिए साख का सवाल बन गया है..

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ख़ुद चुनावी प्रचार में जुटे हैं. एक दिन में कई रैलियां कर रहे हैं.

हालांकि इसके लिए उनकी आलोचना भी हो रही है. आरोप लग रहे हैं कि चुनाव के चलते संसद के सत्र में देरी की जा रही है.
प्रधानमंत्री की भाषा और भाषण पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. अपनी पहली ही रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने ग़रीब पृष्ठभूमि की बात कही. 

उन्होंने रैली में ख़ुद को  गुजरात का बेटा भी कहा.
मोदी एक दशक से ज़्यादा समय तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे हैं. क्या इस चुनाव में उन्हें ज़्यादा मेहनत करनी पड़ रही है?

बीबीसी ने इस मामले में वरिष्ठ पत्रकार आर के मिश्रा से बात की और उनसे पूछा कि 22 साल से गुजरात में राज कर रही भारतीय जनता पार्टी क्या इस बार आशंकित है? उनका आकलन उन्हीं के शब्दों में पढ़िए-

ग़रीबी नरेंद्र मोदी का तुरुप का इक्का था. मैं ये मानता था कि वे इसे आख़िरी 72 घंटे में आज़माएंगे. वे अपील करेंगे कि 'मैं एक चाय वाला था, आप लोगों ने मुझे यहां तक पहुंचाया, आप ही ने मुझे मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री बनाया, अब यह आपकी इज़्ज़त का सवाल है.'


उन्होंने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत ही इससे की, जो ज़ाहिर करता है कि भारतीय जनता पार्टी में कुछ क़िस्म की खलबली ज़रूर है.
जैसा रिस्पॉन्स यहां कांग्रेस, ख़ास तौर पर राहुल गांधी को मिल रहा है. पिछले छह महीनों में बीजेपी ने जो भी अभियान चलाए उसे वैसी तवज्जो नहीं मिली जैसी वो उम्मीद कर रही थी. इसलिए मुझे लगता है कि यह सब चीज़ें आने वाले समय में और तीखी होंगी.
गुजरात में बीजेपी ने इतनी बड़ी 'फ़ौज' क्यों उतारी?

' फ़ैक्ट्स में फ़िक्शन मिलाया जा रहा है '
प्रधानमंत्री को अपने पद की गंभीरता और गरिमा का ध्यान रखना चाहिए और तथ्यों के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए.
प्रधानमंत्री के स्तर पर जब कुछ कहा जाता है तो वह गंभीर बात हो जाती है. लेकिन इस वक़्त बहुत सी चीज़ें जो सच नहीं हैं, वो भी साथ में मिलाई जा रही हैं. फ़ैक्ट्स को फ़िक्शन के साथ जोड़ा जा रहा है.
मोदी कहते हैं कि वो गुजरात के बेटे हैं और कांग्रेस उनके साथ इस किस्म का बर्ताव कर रही है. इस तरीक़े से देखा जाए तो राहुल गांधी के दादा जी भी तो गुजरात के ही हैं.


वे इतिहास को अपने तरीक़े से मोड़ रहे हैं. अब जैसे केशुभाई को हटाने में कांग्रेस का क्या रोल था? उन्हें तो वाघेला ने हटाया जो बीजेपी के साथ थे. जब समझौता हुआ तो वाघेला ने शर्त रखी थी कि मोदी को गुजरात से हटा दिया जाए.

मोदी का आक्रामक प्रचार और वोटकटवा चालें
' सच को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है '
मोदी जी ने चिमनभाई पटेल को भी इसमें लपेट दिया, लेकिन चिमनभाई को हटाने की जो मुहिम थी, उसमें जनसंघ की भारी भूमिका थी.
मैं यह नहीं कहूंगा कि वो झूठ बोल रहे हैं, लेकिन वो इतिहास की ग़लत व्याख्या कर रहे हैं और ग़लत मोड़ दे रहे हैं.
वे ग़रीबी को एक 'बैज ऑफ़ ऑनर' की तरह पहनकर बाक़ी लोगों को ग़लत बता रहे हैं, लेकिन क्या लालबहादुर शास्त्री रईसज़ादे थे? और जो गुजरात के नेता कांग्रेस से लड़ रहे हैं, क्या वो गुजरात के पुत्र नहीं हैं?
न कांग्रेस के न भाजपा के, तो किसके हैं वाघेला?

' गुजरात में ऐसी भाषा कभी इस्तेमाल नहीं की गई '
गुजरात में हमेशा भाषा का विवेक रहा है. प्रधानमंत्री तो बहुत ही अलग लेवल हो जाता है, लेकिन मुख्यमंत्री या उनके नीचे के मंत्रियों के स्तर पर भी हमेशा भाषा का विवेक रहा है.
नेताओं के बीच सामान्य बातचीत या विरोधियों के लिए भी हमेशा आदर-सत्कार रहा है. मैंने तो पिछले 50 साल में गुजरात के इतिहास में इस क़िस्म की राजनीति या ऐसे मुद्दा बनते नहीं देखा.
यह निचले दर्जे़ की सियासत है. ऐसा दिखाया जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी ही अकेली राष्ट्रवादी पार्टी है और बाक़ी जो भी पार्टियां बीजेपी के सामने खड़ी हैं वो राष्ट्रविरोधी हैं.
ये किस क़िस्म की राजनीति है? आप चुनाव में मुद्दे लेकर जाते हैं, लेकिन वे निजी मुद्दों पर जा रहे हैं. कहते हैं 'मैं चाय बेचता था, ग़रीब था.' क्या बीजेपी के सारे नेता अमीर थे?
ऐसी बातें करके पूरी राजनीतिक बहस की गंभीरता को ख़त्म कर रहे हैं.
वे राहुल गांधी को मंदिर में मत्था टेकने पर हमला करते हैं, लेकिन वे भी तो मौलवियों को कैम्पेनिंग के लिए ला रहे हैं.
गुजरात चुनाव और मंदिर में राहुल गांधी!


' मोदी जी ने अकेले नहीं किया विकास
'
गुजरात के जिस विकास की बात होती है तो उसका क्रेडिट मोदी जी अकेले नहीं ले सकते. गुजरात में तरक्की गुजरातियों की वजह से हुई है.
हर सरकार ने राज्य को आगे ले जाने के लिए मेहनत की है. पहला टोल रोड गुजरात में आया जो माधोसिंह सोलंकी के समय में आया.
पहला सरकारी इंडस्ट्रियल एस्टेट मनुभाईशाह के समय में आया जब वे केंद्रीय मंत्री थे.
गुजरात एक प्रगतिशील राज्य है. वहां के विकास को प्रोजेक्ट करके मोदी साहब प्रधानमंत्री बन गए. बड़ी तगड़ी पब्लिसिटी की गई. ग्लोबल समिट हुए. लेकिन वहां लगातार विकास होता रहा है और उसमें सभी का योगदान रहा है.
पिछले चुनाव में मोदी जी ने कहा था कि पांच साल में 50 लाख घर बनाएंगे, पूछिए कि क्या तीन लाख घर भी बने हैं? और कुपोषण का क्या? कुपोषण में गुजरात सबसे आगे है.''
बीजेपी की ज़मीन कमज़ोर या कांग्रेस की ख़ुशफ़हमी

' तीन चुनाव बीते लेकिन मेट्रो नहीं आई
'
बीजेपी के पास नरेंद्र मोदी के अलावा और कुछ दिखाने के लिए नहीं है.
2001 में मोदी जी चुनाव अहमदाबाद में मेट्रो के नाम पर लड़े थे. आज 2017 आ गया है, लेकिन मेट्रो शुरू नहीं हुई जबकि मेट्रो के नाम कम से कम तीन चुनाव जीते गए हैं.
असल में इस वक़्त बीजेपी के पास अपने तुरुप के इक्के के अलावा कुछ दिखाने के लिए नहीं है.
यह सब मुद्दे इसलिए उठाने की ज़रूरत पड़ रही है क्योंकि फ़ैक्ट्स पर आप खड़े नहीं हो पा रहे हैं.
20 साल से आपकी सरकार है और आज भी आपका कैनाल नेटवर्क तैयार नहीं है. आप आज भी पानी का एक बहुत छोटा सा-हिस्सा इस्तेमाल कर पा रहे हैं. इसके लिए आप किसे ब्लेम करेंगे? कांग्रेस को?
20 साल में आप कैनाल नेटवर्क नहीं बना पाए और अब आप कह रहे हैं कि कांग्रेस एक ग़रीब आदमी का मज़ाक उड़ा रही है. यह सब डायवर्ज़न इसलिए खड़े करने की ज़रूरत पड़ रही है.
बेरोज़गारी बढ़ रही है. वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट करके घोषणाएं की गईं कि इतने लाख करोड़ों का निवेश आ गया और इतनी लाख नौकरियां होंगी, लेकिन ऐसा कुछ तो हुआ नहीं.
कॉलेजों में आधी से ज़्यादा एमबीए की सीटें खाली पड़ी हैं. पढ़कर बच्चे पांच-सात हज़ार की नौकरियां ढूंढ रहे हैं.
गुजरात: व्यापारियों का जीएसटी पर ग़ुस्सा, चुनाव पर चुप्पी

' बढ़ते असंतोष की उपज हैं पटेल, मेवानी '
गुजरात में बेरोज़गारी लगताार बढ़ रही है.
हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी, अल्पेश ठाकोर- ये इसलिए नेता नहीं बने क्योंकि इनके पास बहुत पैसा था. ये नेता बने क्योंकि इन्हें उन लोगों का समर्थन मिला जो परेशान हैं.
इनकी आवाज़ सुनी नहीं गई, बल्कि तब की सरकार ने हार्दिक पटेल पर देशद्रोह का आरोप लगा दिया.
ये सब आज इसी वजह से बीजेपी के सामने खड़े हो गए हैं. यह भी एक वजह है कि बीजेपी बौखलाई हुई है.
जिस पार्टी ने पिछला चुनाव 1985 में जीता था आप उसमें मीनमेख निकाल रहे हैं. आप अपना बताइए कि आपने क्या किया?
आप अपनी लकीर लंबी नहीं कर सकते तो दूसरे की छोटी करने में जुट गए हैं.
पिछले कुछ साल में देख लीजिए लोगों में नेगेटिव वोटिंग का चलन बढ़ा है. 'ये तो नहीं, फिर चाहे कोई भी आ जाए' की मानसिकता से वोटिंग होने लगी है.
गुजरात चुनावः कांग्रेस के सामने क्या हैं पांच मुश्किलें?

' ग्रामीण गुजरात में पकड़ खो चुकी है बीजेपी '

भारतीय जनता पार्टी गुजरात के ग्रामीण इलाक़ों में अपनी पकड़ काफ़ी कुछ गंवा चुकी है. इसलिए वे शहरी इलाक़ों पर ही ध्यान दे रहे हैं. अगर आप विकास को भी देखें तो वो भी शहरी इलाक़ों में ही ज़्यादा हुआ है.
गुजरात में बीजेपी का ज़ोर दो बातों पर ही रहेगा, एक- विपक्ष के वोट बैंक को तोड़ा जाए और दूसरे शहरी वोटरों पर ज़्यादा ध्यान दिया जाए.''



(वरिष्ठ पत्रकार आर के मिश्रा से बीबीसी संवाददाता प्रज्ञा मानव की बातचीत पर आधारित).

Sunday, November 26, 2017

ललितपुर: बीजेपी की मोहर लगा मिला वैलेट पेपर, मचा हडकम्प

ललितपुर : उत्तर प्रदेश में निकाय चुनाव के लिए वोट डाले जा रहे है इसी बीच खबर है कि ललितपुर के एक बूथ सेंटर पर पहले से मुहर लगा बैलेट पेपर मिला है जिस पर कमल के निशान पर मुहर लगी हुई है,
अध्यक्ष पद के प्रत्याशी हरीश चंद्र रावत है बीजेपी के प्रत्याशी, बैलेट पेपर पर पहले से मुहर होने से राजनैतिक दलों में हड़कम्प,नगर पंचायत तालबेहट के भाग संख्या 2 के राजकीय बालिका इंटर कॉलेज का मामला.

समाजवादी पार्टी की प्रवक्ता पंखुरी पाठक ने अपने फेसबुक पर इसकी जानकारी साझा की.

आपको बात दे इससे पहले प्रथम चरण के मतदान के दौरान कई पोलिंग बूथ पर इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन से छेड़छाड़ की खबर आई बताया गया कोई भी बटन दबाने पर वोट सिर्फ बीजेपी के खाते में ही गया साथ ही करीब 77 जगह EVM बदलनी पड़ी थी. ये खबरें कानपुर, मेरठ समेत कई जगहों से आई जिस पर चुनाव आयोग ने यूपी निर्वाचन आयोग से जानकारी मांगी.

जनपद में एक नगर पालिका अध्यक्ष समेत तीन नगर पंचायत अध्यक्ष का चुनाव होना है। मगर इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी सेंध लगाने की कोशिश कर रही है। जनपद ललितपुर की तालबेट नगर पंचायत में राजकीय बालिका इंटर कॉलेज के बार्ड संख्या 3 के बूथ संख्या 2 में जैसे ही सुबह मतदान प्रारंभ हुआ वहां पर मत पत्रों में भारतीय जनता पार्टी के चिन्ह पर मोहर लगी पाई गई। जिसे देखकर वहां उपस्थित अन्य पार्टियों के प्रत्याशियों में हड़कंप मच गया। वहीं दूसरी ओर जैसे ही यह खबर जिला प्रशासन में फैली अधिकारियों में हड़कंप मच गया।

इसे पढ़े यूपी निकाय चुनाव: सिंबल का सम्मान और सियासी शान बनाए रखने की लड़ाई

वहां पर मतदान करने आए मतदाता यह देखकर दंग रह गए। प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो उन्होंने बताया कि यहां पर जो बैलेट पेपर मतदान के लिए निकाले गये उन पर पहले से ही कमल के फूल पर मुहर लगी हुई थी। इस खबर के फैलते ही जिला प्रशासन का पूरा आमला राजकीय बालिका इंटर कॉलेज तालबेहट पहुंच गया और वहां पर तत्काल प्रभाव से उस कर्मचारी को हटा दिया गया जिसकी सीट पर यह गड़बड़ी पैदा हुई थी। जनता को भरोसा दिलाया गया कि मतदान निष्पक्ष कराया जाएगा।

अधिकारियों ने नकारा शिरे से

जब इस बात की शिकायत जिलाधिकारी मानवेंद्र सिंह से की गई तो उन्होंने इन आरोपों को सिरे से नकार दिया। उनका कहना है कि वहां पर जो कर्मचारी तैनात था उसके हाथ से मुहर छूटकर बैलेट पेपर पर गिर गई जिस से उस पर निशान बन गए। हालांकि उस कर्मचारी को वहां से हटा दिया गया है अब स्थिति सामान्य है मतदान शांतिपूर्वक किया जा रहा है ।