Monday, June 18, 2018

`मैं बीजेपी से इस्तीफा क्यों दे रहा हूं’ कार्यकर्ता का ओपन लेटर

एक बीजेपी कार्यकर्ता अपनी पार्टी से इस्तीफा क्यों देना चाहता है? बीजेपी के राष्ट्रीय महामंत्री राम माधव की टीम में काम करने वाले शिवम शंकर सिंह ने अपने ब्लॉग में इस्तीफे का एक-एक कारण बताया है.

मिशिगन यूनिवर्सिटी से पास आउट शिवम शंकर सिंह को डेटा एनालिटिक्स में महारत हासिल है, राम माधव के साथ मिलकर उन्होंने बीजेपी को कई पूर्वोत्तर के राज्यों को जीत दिलाने में मदद की है...

आइए जानते हैं वो वजहें जिनके कारण शिवम शंकर सिंह ने पार्टी से इस्तीफा देने का मन बना लिया है.
अपने ब्लॉग की शुरुआत में शिवम लिखते हैं कि बीजेपी ने अविश्वसनीय रूप से प्रभावी प्रचार के साथ-साथ कुछ खास मैसेज को फैलाने में बहुत अच्छा काम किया है और यही 'मैसेज' कारण हैं जिनकी वजह से शिवम अब आगे पार्टी का समर्थन नहीं कर सकते.

अपने ब्लॉग में शिवम आगे बीजेपी सरकार की खामियों को गिनाते हैं. वो कहते हैं कि एक सिस्टम या देश को बनाने में सालों साल लगते हैं और बीजेपी ने बहुत सारी चीजों को बर्बाद कर दिया है. वो 7 खामियों को कुछ इस तरह गिनाते हैं- ((शिवम शंकर सिंह के ब्लॉग के शब्दों में))

1. इलेक्टोरल बॉन्ड्स: इसने करप्शन को लीगलाइज्ड कर दिया है जिसके कारण कोई भी विदेशी शक्ति या कॉरपोरेट सियासी पॉर्टियों को खरीद सकती है. बॉन्ड के बारे में किसी को पता नहीं चलता ऐसे में अगर कोई कॉरपोरेट किसी खास पॉलिसी को लागू कराने के लिए 1 हजार करोड़ का इलेक्टोरल बॉन्ड पार्टी को देता है तो जाहिर है कि उसका काम हो जाएगा. इससे ये भी साफ होता है कि आखिर कैसे मिनिस्ट्रियल लेवल पर करप्शन कम हुआ है.

2. प्लानिंग कमीशन रिपोर्ट: ये डेटा के लिए एक अहम सोर्स था. प्लानिंग कमीशन में योजनाओं को आंका जाता था और फिर तय होता था कि काम किस रफ्तार से और कैसे चल रहा है. अब कोई विकल्प नहीं है. सरकार जो भी डेटा देती है उसपर भरोसा करना पड़ता है. नीति आयोग भी ऐसा नहीं करती, वो तो एक पीआर और थिंक टैंक एजेंसी जैसी है.

3. CBI और ED का गलत इस्तेमाल: जैसा कि मैं देख पा रहा हूं इन एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीति के लिए हो रहा है. अगर ऐसा नहीं भी हो रहा है तो मोदी/शाह के खिलाफ बोलने वालों पर इन एजेंसियों का डर बना हुआ है. विरोध करने वालों को रोकना लोकतंत्र पर खतरा है.

4. कलिखो पुल, जज लोया, शोहराबुद्दीन मर्डर केस की जांच में नाकाम रहना. उन्नाव में एक ऐसे विधायक को बचाना जिसके रिश्तेदार पर एक लड़की के पिता की हत्या का आरोप हो. FIR एक साल बाद दर्ज हो सकी.

5. नोटबंदी: ये नाकाम रहा, लेकिन सबसे बुरा ये है कि बीजेपी इस बात को मानने के लिए तैयार ही नहीं. नोटबंदी से टेरर फंडिंग को रोकने, कैश को कम करने जैसी बातें बेतुकी हैं. इसने कई कारोबार को खत्म कर डाला.

6. जीएसटी: जल्दबाजी में लागू किया गया जिससे कारोबार को नुकसान पहुंचा. एक ही आइटम के लिए अलग-अलग रेट, उलझे हुए ढांचे ने नुकसान ही पहुंचाया है. और बीजेपी ने इस नाकामी को भी स्वीकार नहीं किया है.

7. उलझी हुई विदेश नीति: चीन का श्रीलंका में बंदरगाह है, बांग्लादेश और पाकिस्तान में उसकी खासी रूचि है. हम चारों ओर से घिरे हैं. मालदीव में विदेश नीति असफल रही. इन सबके बावजूद मोदी जी जब विदेश जाते हैं तो ये कहते हैं कि भारतीयों का 2014 से पहले विश्व में कोई सम्मान नहीं था और अब बहुत सम्मान मिल रहा है (ये बिलकुल बेतुका है. विदेश में भारत का सम्मान, बढ़ती अर्थव्यवस्था और आईटी क्षेत्र का सीधा परिणाम होता है. ये मोदी जी की वजह से थोड़ा भी नहीं बढ़ा. बल्कि बीफ के शक में हत्या, पत्रकारों को धमकी की वजह से खराब ही हुआ है.)

8. योजनाओं की विफलता: सांसद आदर्श ग्रामा योजना, मेक इन इंडिया, स्किल डेवलपमेंट, फसल बीमा योजना (ये सरकारें इंश्योरेंस कंपनियों के लिए योजनाएं बना रही हैं क्या?). रोजगार और किसान संकट के लिए कुछ भी नहीं कर सकी है सरकार. हर वास्तविक मुद्दे को विपक्षी पार्टियों का स्टंट बताना.

9. पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम: इसकी कीमतों को लेकर मोदीजी, बीजेपी के मंत्री और सभी समर्थकों ने कांग्रेस की आलोचना की थी. अब पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमत को ये सही बता रहे हैं जबकि पहले की तुलना में कच्चा तेल अभी सस्ता है.

10. सबसे जरूरी मुद्दे पर बात नहीं: एजुकेशन और हेल्थकेयर जैसे सबसे अहम मुद्दों पर बात नहीं होती है. सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छिपी नहीं है. कोई कार्रवाई नहीं की गई. पिछले 4 साल में हेल्थकेयर के भी हालात खस्ता हैं.
बदसूरत क्या है?

शिवम शंकर सिंह ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि उनके मुताबिक इस सरकार का सबसे नकारात्मक चेहरा है कि कैसे इसने देश में बातचीत का मुद्दा ही बदलकर रख दिया. ये पूरे प्लान के तहत किया गया. शिवम ने
मोदी सरकार के 8 ‘बदसूरती’ अपने ब्लॉग में बताई है.

1. सरकार ने मीडिया को बदनाम कर दिया है. हर सवाल उठाने वाले पत्रकार को बिका हुआ साबित करने की कोशिश की गई. ये मुद्दे उठाते हैं और खुद ही उन मुद्दों की अनदेखी कर छोड़ जाते हैं.

2. ऐसा बताया जा रहा है कि 70 साल में भारत में कुछ भी नहीं हुआ, जो हो रहा है इसी सरकार में हो रहा है. ये सरासर झूठ है और ये मानसिकता देश के लिए खतरनाक है. इस सरकार ने विज्ञापनों पर हमारे करदाताओं के पैसे का 4,000 करोड़ खर्च किया और अब ये ट्रेंड बन जाएगा. काम छोटा, ब्रांडिग बड़ी. मोदी कोई ऐसे पहले नहीं थे जो सड़क बनवा रहे हैं, उनसे बेहतर सड़के मायावती और अखिलेश ने बनवाईं हैं. लेकिन हर स्कीम का प्रचार कुछ ऐसे ही किया जा रहा है.
3. फेक न्यूज का प्रचार बेहद तेजी से हुआ है. एंटी बीजेपी फेक न्यूज भी हैं, लेकिन प्रो-बीजेपी और एंटी-अपोजिशन वाले फेक न्यूज की संख्या कई गुना ज्यादा हैं. ज्यादातर ऐसे मैसेज बीजेपी की तरफ से ही आते हैं, ये समाज तोड़ने वाले मैसेज होते हैं. इससे ध्रुवीकरण बढ़ता जा रहा है.

4. हिंदू खतरे में हैं. ये शिगूफा छेड़ दिया गया है. लोगों के दिमाग में ये बिठाया जा रहा है कि हिंदू और हिंदूत्व खतरे में है और मोदी इसे बचाने वाले एकमात्र विकल्प हैं. हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं है.

5. सरकार के खिलाफ बोलने वाले एंटी-नेशनल कहे जाते हैं और अब तो एंटी-हिंदू भी. ऐसी लेबलिंग करके तो सरकार की आलोचना भी बंद कर दी गई है. अपना राष्ट्रवाद साबित करो, हर जगह वंदे मातरम गाते रहो (ऐसे बीजेपी नेता भी वंदेमातरम गाने को कहते हैं जिनको इसका एक शब्द भी नहीं पता!).

6. बीजेपी के स्वामित्व वाले न्यूज चैनल चल रहे हैं, जिनका इकलौता काम है हिंदू-मुस्लिम, नेशनलिस्ट-एंटी नेशनलिस्ट, भारत-पाकिस्तान पर डिबेट करना. लोगों की भावनाओं को भड़काना. असली मुद्दों से उनका दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं.

7. ध्रुवीकरण: विकास का सारा मैसेज खत्म हो गया. अब अगले चुनाव के लिए बीजेपी की रणनीति है ध्रुवीकरण और छद्म राष्ट्रवाद. मोदी जी के भाषणों में भी आपको जिन्ना-नेहरु, कांग्रेस नेताओं ने जेल में भगत सिंह से मुलाकात नहीं की (फेक न्यूज, जो खुद पीएम ने दी) ऐसे ही चीजें मिलेंगी. इन सबके एक ही मायने हैं, ध्रुवीकरण करो और चुनाव जीत लो.
आखिर में शिवम ने लिखा है कि मैं नरेंद्र मोदी जी का साल 2013 से समर्थक था. उनमें मुझे देश के लिए और विकास के लिए आशा की किरण दिखती थी. अब सब खत्म हो गया है. मुझे मोदी और शाह की खामियां उनकी सकारात्मक चीजों से ज्यादा लगती हैं...

( शिवम शंकर सिंह के ब्लॉग को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करे)

Saturday, June 16, 2018

योगी का दिया चेक बाउंस, हाई स्कूल टॉपर ने अखिलेश यादव से मांगी मदद ..

उत्तर प्रदेश में हाईस्कूल टॉपर के चेक के बाउंस होने का मामला सामने आया है। चेक बाउंस होने का दुख खुद स्टूडेंट आकाश द्विवेदी ने सोशल मीडिया ट्विटर के जरिये जाहिर किया है। यह चेक सीएम योगी आदित्यनाथ ने यूपी में 8वीं रैंक लाने वाले आकाश द्विवेदी को अपने हाथों से सौंपा था।
अपने माता-पिता के साथ टॉपर आकाश द्विवेदी।
ट्वीट के बाद डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा ने स्टूडेंट से इसका पूरा विवरण मांगा है लेकिन दोबारा चेक बाउंस होने से एक बार फिर से यूपी सरकार पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

यूपी बोर्ड में हाई स्कूल में जिला टॉपर आकाश द्विवेदी ने जब 11 जून को अपने ट्विटर पर चेक बाउंस होने की जानकारी दी, तो लोगों को इस बात के बारे में पता चला। आकाश द्विवेदी ने पूर्व सीएम अखिलेश यादव, जर्नलिस्ट सुधीर चौधरी, डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को टैग करते हुए लिखा था कि 'सर, मैं आकाश द्विवेदी प्रतापगढ़ जिले का टॉपर, मैंने 2018 की 10वीं की परीक्षा में यूपी में आठवां स्थान प्राप्त किया है। सीएम योगी के द्वारा मुझे एक लाख रुपए का चेक दिया गया लेकिन वो बाउंस हो गया है। मैं दुखी हूं, सुधीर सर हेल्प मी।'

आकाश द्विवेदी ने अखिलेश यादव से मदद भी मांगी।

उसने कहा कि सर मेरी बात सरकार तक पहुंचाने में मदद करें।

डिप्टी सीएम ने दिया जवाब
पीड़ित स्टूडेंट के ट्वीट का जवाब देते हुए डिप्टी सीएम ने कहा कि 'कृपया आप तत्काल संजय अग्रवाल अपर मुख्य सचिव या मुझसे फोन पर अथवा मिलकर पूरा विवरण दें।'
बता दें कि चेक बाउंस होने का यह पहला मामला नहीं है...

Friday, May 25, 2018

पेट्रो मूल्य वृद्धि को लेकर मोदी से जुड़े ये कार्टून सोशल मीडिया पर हुए सुपरहिट

अब सुनिए पेट्रोल के दाम बढ़ने का सबसे बड़ा फायदा (नजर बहुत दूर तक रखियेगा)… पेट्रोल का मूल्य बढ़ने से देश में अस्पतालों की जरूरत ख़त्म हो जाएगी। लोग बाइक और कारें कबाड़ी के हाथों सस्ते में बेच लेंगे (कबाड़ी को रोजगार के अवसर मिलेंगे) और साइकिल से अपनी यात्राओं का आनंद लेंगे।

अधिक शारीरिक मेहनत करने के कारण लोग कम से कम बीमार पड़ेंगे, शरीर मेनटेन रहेगा। इस कारण दवाओं पर और चेकअप पर होने वाला खर्च बचाकर लोग धंधे पर और टैक्स देने पर लगायेंगे। देश का खजाना भरेगा परिणाम स्वरुप देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

साइकिल से चलने का दूसरा लाभ ये होगा(ये पेट्रोल मूल्य वृद्धि का ही फायदा है, न भूलें) कि लोग अपनी यात्रा को सुगम और रोमांचक बनाने के लिए सड़क के किनारे घने पेड़ लगाने की व्यवस्था करेंगे। अभी ये काम सरकार को करना पड़ता है लेकिन जब धुप में एक घंटा साइकल खींचने पर एक हाथ लम्बी कुत्ते जैसी जबान निकलेगी तो खुद से पेड़ लगायेंगे। इस तरह पर्यावरण में आमूलचूल परिवर्तन होंगे। पेड़ों की वजह से वर्षा चक्र नियमित होगा।

फ़िलहाल मेरा फेफड़ा फूलने लगा है इसके फायदे खोजते खोजते, कुछ आप लोग भी खोजिये। इससे पहले कि राष्ट्र(वि)वादी आयें, मुझे ‘कोसाध्यक्ष’ की उपाधि से सम्मानित करें और गालियों से मेरा पेट भर दें, चल के थोड़ा नाश्ता कर लिया जाए। हर देशभक्त शेयर करे.

Sunday, May 13, 2018

भगत सिंह और नेहरू को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने जो बोला है, वो ग़लत नहीं बल्कि झूठ है

नेहरू से लड़ते-लड़ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चारों तरफ नेहरू का भूत खड़ा हो गया. नेहरू का अपना इतिहास है. वो किताबों को जला देने और तीन मूर्ति भवन के ढहा देने से नहीं मिटेगा. यह ग़लती ख़ुद मोदी कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री मोदी के लिए चुनाव जीतना बड़ी बात नहीं है. वे जितने चुनाव जीत चुके हैं या जिता चुके हैं यह रिकॉर्ड भी लंबे समय तक रहेगा. कर्नाटक की जीत कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन आज प्रधानमंत्री मोदी को अपनी हार देखनी चाहिए. वे किस तरह अपने भाषणों में हारते जा रहे हैं. आपको यह हार चुनावी नतीजों में नहीं दिखेगी. वहां दिखेगी जहां उनके भाषणों का झूठ पकड़ा जा रहा होता है. उनके बोले गए तथ्यों की जांच हो रही होती है. इतिहास की दहलीज़ पर खड़े होकर झूठ के सहारे प्रधानमंत्री इतिहास का मज़ाक उड़ा रहे हैं. इतिहास उनके इस दुस्साहस को नोट कर रहा है.

प्रधानमंत्री मोदी ने अपना शिखर चुन लिया है. उनका एक शिखर आसमान में भी है और एक उस गर्त में हैं जहां न तो कोई मर्यादा है न स्तर है. उन्हें हर कीमत पर सत्ता चाहिए ताकि वे सबको दिखाई दें शिखर पर मगर ख़ुद रहें गर्त में. यह गर्त ही है कि नायक होकर भी उनकी बातों की धुलाई हो जाती है. इस गर्त का चुनाव वे ख़ुद करते हैं. जब वे ग़लत तथ्य रखते हैं, झूठा इतिहास रखते हैं, विरोधी नेता को उनकी मां की भाषा में बहस की चुनौती देते हैं. ये गली की भाषा है, प्रधानमंत्री की नहीं.

दरअसल प्रधानमंत्री मोदी के लिए नेहरू चुनौती बन गए हैं. उन्होंने खुद नेहरू को चुनौती मान लिया है. वे लगातार नेहरू को खंडित करते रहते हैं. उनके समर्थकों की सेना व्हाट्सऐप नाम की झूठी यूनिवर्सिटी में नेहरू को लेकर लगातार झूठ फैला रही है. नेहरू के सामने झूठ से गढ़ा गया एक नेहरू खड़ा किया जा रहा है. अब लड़ाई मोदी और नेहरू की नहीं रह गई है. अब लड़ाई हो गई है असली नेहरू और झूठ से गढ़े गए नेहरू की. आप जानते हैं इस लड़ाई में जीत असली नेहरू की होगी.

नेहरू से लड़ते-लड़ते प्रधानमंत्री मोदी के चारों तरफ नेहरू का भूत खड़ा हो गया. नेहरू का अपना इतिहास है. वो किताबों को जला देने और तीन मूर्ति भवन के ढहा देने से नहीं मिटेगा. यह ग़लती खुद मोदी कर रहे हैं. नेहरू-नेहरू करते-करते वे चारों तरफ नेहरू को खड़ा कर रहे हैं. मोदी के आस-पास अब नेहरू दिखाई देने लगे हैं. उनके समर्थक भी कुछ दिन में नेहरू के विशेषज्ञ हो जाएंगे, मोदी के नहीं. भले ही उनके पास झूठ से गढ़ा गया नेहरू होगा मगर होगा तो नेहरू ही.

प्रधानमंत्री के चुनावी भाषणों को सुनकर लगता है कि नेहरू का यही योगदान है कि उन्होंने कभी बोस का, कभी पटेल का तो कभी भगत सिंह का अपमान किया. वे आज़ादी की लड़ाई में नहीं थे, वे कुछ नेताओं को अपमानित करने के लिए लड़ रहे थे. क्या नेहरू इन लोगों का अपमान करते हुए ब्रिटिश हुकूमत की जेलों में 9 साल रहे थे?

इन नेताओं के बीच वैचारिक दूरी, अंतर्विरोध और अलग-अलग रास्ते पर चलने की धुन को हम कब तक अपमान के फ्रेम में देखेंगे. इस हिसाब से तो उस दौर में हर कोई एक दूसरे का अपमान ही कर रहा था. राष्ट्रीय आंदोलन की यही खूबी थी कि अलग-अलग विचारों वाले एक से एक कद्दावर नेता थे. ये खूबी गांधी की थी.

उनके बनाए दौर की थी जिसके कारण कांग्रेस और कांग्रेस से बाहर नेताओं से भरा आकाश दिखाई देता था. गांधी को भी यह अवसर उनसे पहले के नेताओं और समाज सुधारकों ने उपलब्ध कराया था. मोदी के ही शब्दों में यह भगत सिंह का भी अपमान है कि उनकी सारी कुर्बानी को नेहरू के लिए रचे गए एक झूठ से जोड़ा जा रहा है.

भगत सिंह और नेहरू को लेकर प्रधानमंत्री ने जो ग़लत बोला है, वो ग़लत नहीं बल्कि झूठ है. नेहरू और फील्ड मार्शल करियप्पा, जनरल थिम्मैया को लेकर जो ग़लत बोला है वो भी झूठ था. कई लोग इस ग़लतफ़हमी में रहते हैं कि प्रधानमंत्री की रिसर्च टीम की ग़लती है. आप ग़ौर से उनके बयानों को देखिए.
जब आप एक शब्दों के साथ पूरे बयान को देखेंगे तो उसमें एक डिज़ाइन दिखेगा.

भगत सिंह वाले बयान में ही सबसे पहले वे खुद को अलग करते हैं. कहते हैं कि उन्हें इतिहास की जानकारी नहीं है और फिर अगले वाक्यों में विश्वास के साथ यह कहते हुए सवालों के अंदाज़ में बात रखते हैं कि उस वक्त जब भगत सिंह जेल में थे तब कोई कांग्रेसी नेता नहीं मिलने गया. अगर आप गुजरात चुनावों में मणिशंकर अय्यर के घर हुए बैठक पर उनके बयान को इसी तरह देखेंगे तो एक डिज़ाइन नज़र आएगा.

बयानों के डिज़ाइनर को यह पता होगा कि आम जनता इतिहास को किताबों से नहीं कुछ अफवाहों से जानती है. भगत सिंह के बारे में यह अफवाह जनसुलभ है कि उस वक्त के नेताओं ने उन्हें फांसी से बचाने का प्रयास नहीं किया. इसी जनसुलभ अफवाह से तार मिलाकर और उसके आधार पर नेहरू को संदिग्ध बनाया गया.

नाम लिए बग़ैर कहा गया कि नेहरू भगत सिंह से नहीं मिलने गए. यह इतना साधारण तथ्य है कि इसमें किसी भी रिसर्च टीम से ग़लती हो ही नहीं सकती. तारीख या साल में चूक हो सकती थी मगर पूरा प्रसंग ही ग़लत हो यह एक पैटर्न बताता है.

ये और बात है कि भगत सिंह सांप्रदायिकता के घोर विरोधी थे और ईश्वर को ही नहीं मानते थे. सांप्रदायिकता के सवाल पर नास्तिक होकर जितने भगत सिंह स्पष्ट हैं, उतने ही ऐग्नास्टिक (अनीश्वरवादी ) होकर नेहरू भी हैं. बल्कि दोनों करीब दिखते हैं. नेहरू और भगत सिंह एक दूसरे का सम्मान करते थे. विरोध भी होगा तो क्या इसका हिसाब चुनावी रैलियों में होगा.

नेहरू का सारा इतिहास मय आलोचना अनेक किताबों में दर्ज है. प्रधानमंत्री मोदी अभी अपना इतिहास रच रहे हैं. उन्हें इस बात ख़्याल रखना चाहिए कि कम से कम वो झूठ पर आधारित न हो. उन्हें यह छूट न तो बीजेपी के प्रचारक के तौर पर है और न ही प्रधानमंत्री के तौर पर.
कायदे से उन्हें इस बात के लिए माफी मांगनी चाहिए ताकि व्हाट्स अप यूनिवर्सिटी के ज़रिए नेहरू को लेकर फैलाए जा रहे ज़हर पर विराम लगे. अब मोदी ही नेहरू को आराम दे सकते हैं. नेहरू को आराम मिलेगा तो मोदी को भी आराम मिलेगा.

(यह लेख मूलतः रवीश कुमार के फेसबुक पेज पर प्रकाशित हुआ है.)

Wednesday, April 18, 2018

क्या मोदी सरकार के FRDI बिल के खौफ से खाली हो रहे हैं एटीएम?

क्या है एफआरडीआई बिल

प्रस्तावित एफआरडीआई बिल के जरिए केन्द्र सरकार सभी वित्तीय संस्थाओं जैसे बैंक, इंश्योरेंस कंपनी और अन्य वित्तीय संगठनों का इंसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी कोड के तहत उचित निराकरण करना चाह रही है. इस बिल को कानून बनाकर केन्द्र सरकार बीमार पड़ी वित्तीय कंपनियों को संकट से उबारने की कोशिश करेगी.

इस बिल की जरूरत 2008 के वित्तीय संकट के बाद महसूस की गई जब कई हाई-प्रोफाइल बैंकरप्सी देखने को मिली थी. इसके बाद से केन्द्र सरकार ने जनधन योजना और नोटबंदी जैसे फैसलों से लगातार कोशिश की है कि ज्यादा से ज्यादा लोग बैंकिंग व्यवस्था के दायरे में रहें.
इसके चलते यह बेहद जरूरी हो जाता है कि बैंकिंग व्यवस्था में शामिल हो चुके लोगों को बैंक या वित्तीय संस्था के डूबने की स्थिति में अपने पैसों की सुरक्षा की गारंटी रहे.

एफआरडीआई बिल का प्रमुख प्रावधान

इस बिल में एक रेजोल्यूशन कॉरपोरेशन का प्रावधान है जिसे डिपॉजिट इंश्योरेंस और क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन की जगह खड़ा किया जाएगा.

यह रेजोल्यूशन कॉरपोरेशन वित्तीय संस्थाओं के स्वास्थ्य की निगरानी करेगा और उनके डूबने की स्थिति में उसे बचाने का प्रयास करेगा. वहीं जब वित्तीय संस्था का डूबना तय रहेगा तो ऐसी स्थिति में उनकी वित्तीय देनदारी का समाधान करेगा. गौरतलब है कि रेजोल्यूशन कॉरपोरेशन का एक अहम काम ग्राहकों को डिपॉजिट इंश्योरेंस देने का भी है हालांकि अभी इस इंश्योरेंस की सीमा निर्धारित नहीं की गई है.

क्यों है एफआरडीआई बिल से डर

एफआरडीआई बिल के जरिए रेजोल्यूशन कॉरपोरेशन को फेल होने वाली संस्था को उबारने के लिए (बेल इन) कदम उठाने का भी अधिकार है.

जहां बेल आउट के जरिए सरकार जनता के पैसे को सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था में निवेश करती है जिससे उसे उबारा जा सके वहीं बेल इन के जरिए बैंक ग्राहकों के पैसे से संकट में पड़े बैंक को उबारने का काम किया जाता है.

एफआरडीआई बिल के इसी प्रावधान के चलते आम लोगों में डर है कि यदि उनका बैंक विफल होता है तो उन्हें अपनी गाढ़ी कमाई से हाथ धोना पड़ सकता है. गौरतलब है कि मौजूदा प्रावधान के मुताबिक किसी बैंक के डूबने की स्थिति में ग्राहक को उसके खाते में जमा कुल रकम में महज 1 लाख रुपये की गारंटी रहती है और बाकी पैसा लौटाने के लिए बैंक बाध्य नहीं रहते. प्रस्तावित एफआरडीआई बिल में फिलहाल सरकार ने गांरटी की इस रकम पर अभी कोई फैसला नहीं लिया है.