Thursday, May 28, 2020

China ki sajis corona वुहान की महामारी एक सोची समझी साजिश थी कैसे वुहान अचानक घातक वायरस से मुक्त हुआ?

👉दृश्य 1 :
पर्दा खुलता है: चीन बीमार हो जाता है, एक "संकट" में प्रवेश करता है और अपने व्यापार को पंगु बना देता है। पर्दा बंद हो जाता है।

👉दृश्य 2
पर्दा खुलता है: चीनी मुद्रा का अवमूल्यन होता है। वे कुछ नहीं करते। पर्दा बंद हो जाता है।

👉दृश्य 3
पर्दा खुलता है: यूरोप और अमरीका की कंपनियों के व्यापार में कमी के कारण इन कंपनियों के शेयरों के भाव गिर जाते है उनके मूल्य के 40% तक, जो चीन में स्थित हैं चीन कुछ नहीं करता है

👉दृश्य 4
पर्दा खुलता है: दुनिया बीमार है, चीन यूरोप और अमेरिका की कंपनियों के शेयर 30% से भी कम कीमत पर खरीद लेता है। जब दुनिया में इस बीमारी के कारण सारे व्यापार धंधे बंद पड़ जाते है, पर्दा बंद हो जाता है।

👉दृश्य 5
पर्दा खुलता है: चीन ने इस बीमारी को नियंत्रित कर लिया है और अब वह यूरोप और अमेरिका में कंपनियों का मालिक है। क्योंकि यहां व्यापार धंधे ध्वस्त हो चुके हैं और वह यह तय करता है कि ये कंपनियां चीन में रहें और $20,000 बिलियन कमाएं। पर्दा बंद हो जाता है। नाटक इसे कहा जाता है?

👉दृश्य 6
शह और मात
फिर से देखना लेकिन सच है
कल और आज के बीच दो वीडियो जारी हुए हैं, जिनसे मुझे कुछ संदेह हुआ, कोई जरूरी नहीं हो सकता हो यह सिर्फ मेरी अटकल हो। पर मुझे विश्वास है कि कोरोनो वायरस का जानबूझकर स्वयं चीन द्वारा फैलाया गया था। वो पहले से ही तैयार थे इस नाटक के शुरू होने के तीन हफ्ते में ही उन्होंने 12,000 बिस्तर वाले अस्पताल पहले से ही बनवा लिए कैसे? क्या वास्तव में उन्होंने इनका निर्माण दो सप्ताह में किया हो ही नहीं सकता वो उनका निर्माण पहले से ही कर चुके थे क्योंकि ये सब एक योजना का हिस्सा था।
उन्होंने घोषणा की कि उन्होंने महामारी को रोक दिया है। वे जश्न मनाते हुए वीडियो में दिखाई देते हैं, वे घोषणा करते हैं कि उनके पास एक टीका भी है। सभी आनुवंशिक जानकारी के बिना वे इसे इतनी जल्दी कैसे बना सकते हैं? पर यदि आप खुद ही इस नाटक के निर्माता हो तो यह बिल्कुल मुश्किल भी नहीं है। और आज मैंने सिर्फ एक वीडियो देखा जो बताता है कि कैसे जिन पिंग जो दुनिया के शक्तिशाली देश का राष्ट्रपति है उसने पूरी दुनिया को बगैर किसी युद्ध के घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया कोरोना वायरस के कारण, चीन में पश्चिमी देशों की कंपनियों का कारोबार नाटकीय रूप से गिर गया जब दुनिया भर के स्टॉक एक्सचेंजों में इन कंपनियों के शेयर के भाव गिर गए तो उन्हें चीनियों द्वारा खरीद लिया गया। अब चीन, अमेरिका और यूरोप में इन्हीं एक्सचेंजों और अपनी पूंजी द्वारा यह डिसाइड करेगा कि बाज़ार का रुख केसा होगा, औेर कीमतों को निर्धारित करने में सक्षम होगा पश्चिम को अपनी जरूरत की हर चीज बेचने के लिए। क्या गजब की योजना?
हाँ इसमें संयोग से कुछ बूढ़े मर गए? कम उम्र के लोग भी मारे गए पर ना तो चीन को इसकी परवाह है और ना ही कोई बड़ी समस्या वो इनके परिजनों को थोड़े समय मुआवजे के रूप में पेंशन दे देगा, पर इसके एवज उसने कितनी बड़ी लूट की है। और अभी पश्चिम आर्थिक रूप से पराजित है, संकट में और बीमारी से स्तब्ध। और बिना कुछ जाने की यह सब एक योजना का हिस्सा है और बहुत ही सोच समझ कर बनाई गई परफेक्ट योजना।

👉अब चीन 1.18 ट्रिलियन होल्डिंग वाले जापान के बाद अमेरिकी खजाने के सबसे बड़े मालिक है।
अब देखिए इस नाटक के दूसरे किरदारों का रोल केसे रूस और उत्तर कोरिया में करोना नामक घातक बीमारी के केस इतने कम है जबकि वे तो चीन के सहयोगी है उनके आपस में आवाजाही भी ज्यादा है फिर भी कैसे उनके यहां करोना ने वैसा विकराल रूप नहीं दिखाया जैसा की अन्य अमेरिकी और यूरोपीय देशों में देखने को मिला

क्या इसलिए कि वे चीन के कट्टर सहयोगी हैं
दूसरी ओर संयुक्त राज्य अमेरिका/दक्षिण कोरिया/यूनाइटेड किंगडम/फ्रांस/इटली/स्पेन और एशिया गंभीर रूप से प्रभावित हैं

👉वुहान की महामारी एक सोची समझी साजिश थी कैसे वुहान अचानक घातक वायरस से मुक्त हुआ?

चीन का कहना है कि उसके द्वारा उठाए गए कठोर उपाय के कारण वुहान करोना मुक्त हो गया कैसे वो कौन से उपाय थे चीन ने उनका खुलासा नहीं किया चलिए हम इसको इस तरह से देखते है कि वुहान ही क्यों जो वायरस पूरी दुनिया में फेल गया वो वायरस चीन के दूसरे हिस्सों में क्यों नहीं फैला बीजिंग जो कि चीन की राजधानी थी वह इसका कोई भी असर देखने को क्यों नहीं मिला क्या एक संक्रमित बीजिंग तक नहीं पहुंचा जबकि पूरी दुनिया में संक्रमण फेल चुका है या फिर इस नाटक को सिर्फ वुहान के लिए रचा गया था क्या एक भी संक्रमित व्यक्ति ने नवम्बर से लेकर जनवरी तक वुहान से चीन के अन्य हिस्सों में यात्रा नहीं की जबकि इसके उलट ये संक्रमित दुनिया के लगभग हर कोने में पहुंच गए वो भी अच्छी खासी तादाद में केसे? क्यों?

बीजिंग में करोना से एक व्यक्ति नहीं मारा गया? और सिर्फ वुहान में हजारों
यह विचार करना और दिलचस्प है, की अब कैसे चीन ने इस पर काबू पा लिया उन्होंने इसका क्या इलाज किया और फिर अब उसे व्यापार के लिए खोल भी दिया आखिर कैसे जबकि दुनिया भर के डाक्टर इसका इलाज ढूंढ रहे हैं तो चीनियों ने केसे ये चमत्कार कर लिया
खैर
👉करोना को हमें व्यापार युद्ध में यूएसए द्वारा चीन की बांह मोड़ने की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए
👉अमेरिका और उपर्युक्त सभी देश आर्थिक रूप से तबाह हैं
जल्द ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था चीन की योजना के अनुसार ढह जाएगी।
चीन जानता है कि वह अमेरिका को सैन्य रूप से नहीं हरा सकता क्योंकि अमरीका वर्तमान में दुनिया में सबसे शक्तिशाली देश है।
तो उसने यहां वाइरस का उपयोग किया जो कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था और रक्षा क्षमताओं को पंगु बना दें।
राष्ट्रपति ट्रम्प हमेशा से यह बताते रहे हैं कि कैसे अमेरिकी अर्थव्यवस्था सभी मोर्चों पर सुधार कर रही थी और नौकरियां संयुक्त राज्य अमेरिका में वापस आ रही थीं।
AMERICA GREAT AGAIN बनाने की उनकी दृष्टि को नष्ट करने का एकमात्र तरीका एक ECONOMIC HAVOC है।
चीन  मिलकर एक वायरस जारी करके ट्रम्प को नष्ट कर दिया जाए।
👉वुहान की महामारी एक सोची समझी साजिश थी।
आप ही सोचिए महामारी के चरम पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग उन प्रभावी क्षेत्रों का दौरा करने के लिए जाते वक़्त बस एक साधारण आरएम 1 फेसमास्क पहने हुए थे जबकि इटली में इस महामारी का इलाज कर रहे डाक्टर पूरी तरह कवर होने और सावधानी बरतने के बाद भी संक्रमित हो रहे है
राष्ट्रपति के रूप में उन्हें सिर से पैर तक ढंका जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं था क्यों? क्या इसीलिए की इस महामारी से होने वाले किसी भी प्रकार के नुकसान से बचने के लिए उन्होंने पहले से ही कोई टीका लगा रखा था इसका मतलब है की इस महामारी का इलाज पहले ही ढूंढ लिया गया था बाद में इस वायरस को फैलाया गया है शायद यह सब चीन की योजना थी

👉अब ECONOMIC COLLAPSE के कगार पर बैठे देशों से अधिकतर शेयर स्टॉक खरीदने के बाद विश्व अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने की बाद में चीन यह घोषणा करेगा कि उनके मेडिकल शोधकर्ताओं ने वायरस को नष्ट करने का इलाज ढूंढ लिया है और इस तरह इस नाटक की समाप्ति की घोषणा हो जाएगी और बिना किसी युद्ध के चीन ने अपना साम्राज्य पूरी दुनिया में फैला दिया अब वह अपने देश में बैठे बैठे ही किसी भी देश की अर्थवयवस्था को हिला सकता है जैसा की अभी भारत ने मलेशिया के साथ किया था जब मलेशिया के राष्ट्रपति ने धारा 370 के खिलाफ बयान दिए थे उसके बाद भारत ने वहा के बाजार को हिलाकर रख दिया ऐसा ही अब चीन भी अपने सभी पश्चिमी गठबंधनों के साथ मिलकर विश्व की अलग देशों की अर्थव्यवस्था के साथ करेगा, और ये देश बहुत जल्द ही अपने नए मास्टर चीन के गुलाम हो जाएंगे भविष्य का युद्ध हथियारों से नहीं व्यापार से शेयर स्टॉक से लड़ा जाएगा और चीन ने इस विश्व युद्ध की शुरुआत कर दी है आपको हमें और देश को समझना होगा कि इस तरह के युद्ध में हमारी रणनीति क्या हो।

👉वुहान से शंघाई = 839 km
👉वुहान से बीजिंग = 1152 km
👉वुहान से मिलान = 15000 km
👉वुहान से न्यूयॉर्क = 15000 km
👉वुहान से ईटली= 8695km
👉वुहान से भारत= 3695 km
👉वुहान से ईरान = 5667 km
👉पास के बीजिंग/शंघाई में कोरोना का कोई प्रभाव नहीं
लेकिन इटली,ईरान,यूरोप देशों में लोगों की मृत्यु और पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था बर्बाद
चीन के सभी व्यापारिक क्षेत्र सुरक्षित
कुछ तो गड़बड़ है।

Sunday, November 10, 2019

Jaunpur

Jaunpur stands pretty in the south-eastern part of Uttar Pradesh .

The district lies at a global location of 82.44° east longitude and 25.46° north latitude.

Jaunpur falls under the Varanasi Division of Uttar Pradesh. It covers a total area of 4,038sq.km.

The population in the district of Jaunpur is 44,76,072. The headquarters is located in Jaunpur.

Facts of Jaunpur District
State Uttar Pradesh
District Jaunpur
District HQ Jaunpur
Population (2011) 4494204
Growth 14.89%
Sex Ratio 1024
Literacy 71.55
Area (km 2) 4038
Density (/km 2) 1108

Tehsils Badlapur, Jaunpur, Kerakat, Machhlishahr, Mariahu, Shahganj
Lok Sabha Constituencies Jaunpur, Machhlishahr
Assembly Constituencies Badalpur, Jaunpur, Kerakat, Machhlishahr, Malhani, Mariyahu, Mungra Badshahpur, Shahganj, Zafrabad
Languages Hindi, Urdu
Rivers Gomti, Sai
Lat-Long 25.725684,82.687797
Travel Destinations Shahi Qila, Main Gate, Atala Mosque, Jhanjhari Mosque, Lal Darwaza Mosque, Jama Mosque, Shahi Pul, Kali Temple, Gasuri Shankar Temple, Hanuman Temple, Kabir Math, Gomteshwar Mahadev etc.
Government Colleges/Universities Veer Bahadur Singh Purvanchal University, T D College etc.

Saturday, November 9, 2019

Ayodhya Verdict: सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फ़ैसले की बड़ी बातें

Ayodhya Verdict:
अयोध्या में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद ज़मीन विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई ने फ़ैसला सुना दिया है. 40 दिनों तक चली सुनवाई के बाद शनिवार को इस दशकों पुराने मामले में पांच जजों की बेंच ने सर्वसम्मति से अपना फ़ैसला दिया.
इस फ़ैसले की अहम बातें

जहां पर बाबरी मस्जिद के गुंबद थे वो जगह हिन्दू पक्ष को मिली.

अदालत ने कहा कि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए पाँच एकड़ अलग उपयुक्त ज़मीन दी जाए.

ज़मीन पर हिंदुओं का दावा उचित है. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर अयोध्या पर एक कार्ययोजना तैयार करने का कहा है.

पक्षकार गोपाल विशारद को मिला पूजा-पाठ का अधिकार.

कोर्ट ने कहा है कि बनायी गई ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े को शामिल करना है या नहीं ये फ़ैसला केंद्र सरकार करेगी.

आस्था के आधार पर मालिकाना हक़ नहीं दिया जा सकता.

निर्मोही अखाड़ा का दावा खारिज.

बाबरी मस्जिद के नीचे एक संरचना पाई गई है जो मूलतः इस्लामी नहीं थी. विवादित भूमि पर अपने फ़ैसले में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि पुरातत्व विज्ञान को नकारा नहीं जा सकता.
अंदर के चबूतरे पर कब्ज़े को लेकर गंभीर विवाद रहा है. 1528 से 1556 के बीच मुसलमानों ने वहां नमाज़ पढ़े जाने का कोई सबूत पेश नहीं किया गया.

बाहरी चबूतरे पर मुसलमानों का क़ब्ज़ा कभी नहीं रहा. 6 दिसंबर की घटना से यथास्थिति टूट गई.
सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड इस स्थान के इस्तेमाल का सबूत नहीं दे पाया.

बाहरी चबूतरे पर हमेशा से हिन्दुओं का क़ब्ज़ा रहा. ऐतिहासिक यात्रा वृतांतों को भी ध्यान में रखा गया है.
ऐतिहासिक यात्रा वृतांत बताते हैं कि सदियों से मान्यता रही है कि अयोध्या ही राम का जन्मस्थान है.
हिन्दुओं की इस आस्था को लेकर कोई विवाद नहीं है. आस्था उसे मानने वाले व्यक्ति की निजी भावना है.

Monday, August 19, 2019

आरएसएस के हिंदूवादियों की सात शर्मनाक गलतियां, क्या देश कभी माफ कर सकेगा?

आरएसएस के हिंदूवादियों की सात शर्मनाक गलतियां, क्या देश कभी माफ कर सकेगा?

भारत के इतिहास में कई ऐसे पन्ने हैं जो हिंदू महासभा और आरएसएस के नाम पर कलंक के तौर पर दर्ज हैं. अपने मजबूत प्रचारतंत्र के बूते क्या संघ ये दाग धो पाएगा. पढ़िए क्या हैं संघ के वो सात कलंक.

1. भारत के विभाजन के विचार की नींव रखना
भारत विभाजन का समर्थन किया. विनायक दामोदर सावरकर. द्विराष्ट्र सिद्धांत के समर्थक थे जिन्ना और सावरकर दोनों चाहते थे कि एक हिंदू राष्ट्र बने और एक इस्लामिक राष्ट्र, कहा कि हिंदू और मुसलमान अलग देश हैं कभी साथ नहीं रह सकते. पहले सावरकर ये प्रस्ताव लेकर आए और इसके तीन साल बाद ही जिन्ना ने भी द्विराष्ट्र सिद्धांत का समर्थन किया. (हिंदू महासभा के 19वें अधिवेशन में सावरकर का भाषण, 1937) बाद में संघ ने भारत विभाजन का विरोध करने वाले गांधी की हत्या करके उन्हें ही विभाजन का दोषी ठहराने के लिए दुष्प्रचार किया गया. इतिहासकार कहते हैं कि संघ ने उग्र हिंदू वातावरण न बनाया होता तो शायद जिन्ना अलग राष्ट्र नहीं मांगते.
सावरकर और जिन्ना दोनों चाहते थे कि एक हिंदू राष्ट्र बने और एक इस्लामिक राष्ट्र

2. आर्मी को तोड़ने की साजिश
भारत के खिलाफ साजिश. देश के आजाद होने के तीसरे साल ही संघ ने एक साजिश रची. आर्मी चीफ जनरल करिअप्पा को कत्ल करने की साजिश. संघ ने पहले उत्तर भारत और दक्षिण भारत का ध्रुवीकरण किया फिर कुछ सिख युवकों को भड़काकर करिअप्पा की हत्या की कोशिश की. मामले में 6 लोगों को सजा हुई थी (स्रोत - 2017 में रिलीज हुए सीआईए के डिक्लासिफाइड किए गए दस्तावेज़)
1950 में रची गई थी जनरल करियप्पा की हत्या की साजिश

3. नेताजी सुभाष चंद्र बोस से गद्दारी
जब भारत की आजादी के लिए नेता जी सुभाषचंद्र बोस जापान की मदद लेने गए थे तो संघ ने अंग्रेजों का साथ दिया. हिंदू महासभा ने ‘वीर’ सावरकर के नेतृत्व में ब्रिटिश फौजों में भर्ती के लिए शिविर लगाए. हिंदुत्ववादियों ने अंग्रेज शासकों के समक्ष मुकम्मल समर्पण कर दिया था जो ‘वीर’ सावरकर के निम्न वक्तव्य से और भी साफ हो जाता है-
‘जहां तक भारत की सुरक्षा का सवाल है, हिंदू समाज को भारत सरकार के युद्ध संबंधी प्रयासों में सहानुभूतिपूर्ण सहयोग की भावना से बेहिचक जुड़ जाना चाहिए जब तक यह हिंदू हितों के फायदे में हो. हिंदुओं को बड़ी संख्या में थल सेना, नौसेना और वायुसेना में शामिल होना चाहिए और सभी आयुध, गोला-बारूद, और जंग का सामान बनाने वाले कारखानों वगैरह में प्रवेश करना चाहिए…'
गौरतलब है कि युद्ध में जापान के कूदने के कारण हम ब्रिटेन के शत्रुओं के हमलों के सीधे निशाने पर आ गए हैं. इसलिए हम चाहें या न चाहें, हमें युद्ध के कहर से अपने परिवार और घर को बचाना है और यह भारत की सुरक्षा के सरकारी युद्ध प्रयासों को ताकत पहुंचा कर ही किया जा सकता है. इसलिए हिंदू महासभाइयों को खासकर बंगाल और असम के प्रांतों में, जितना असरदार तरीके से संभव हो, हिंदुओं को अविलंब सेनाओं में भर्ती होने के लिए प्रेरित करना चाहिए’ (स्रोत- वीर सावरकर समग्र वांड्मय)

4. महात्मा गांधी की हत्या
आरएसएस ने की या नहीं इसको लेकर विवाद है. गांधी के मारे जाने को वो सही तो मानते रहे हैं लेकिन हत्या की साजिश से इनकार करते हैं. लेकिन यहां कुछ जानकारियां हैं जो कहती हैं कि गांधी को मारने के पीछे संघ था. गांधी जी की हत्या के मामले में आठ आरोपी थे– नाथूराम गोडसे और उनके भाई गोपाल गोडसे, नारायण आप्टे, विष्णु करकरे, मदनलाल पाहवा, शंकर किष्टैया, विनायक दामोदर सावरकर और दत्तात्रेय परचुरे. इस गुट का नौवां सदस्य दिगंबर रामचंद्र बडगे था जो सरकारी गवाह बन गया था. ये सब आरएसएस या हिंदू महासभा या हिंदू राष्ट्र दल से जुडे हुए थे. अदालत में दी गई बडगे की गवाही के आधार पर ही सावरकर का नाम इस मामले से जुड़ा था और गांधी की हत्या के बाद हिंदू महासभा और आरएसएस पर प्रतिबंध लग गया था. यानी गांधी की हत्या में संघ को क्लीन चिट नहीं दी जा सकती.
अगर गांधी दस साल और रहते तो देश में सिद्धांत की राजनीति मजबूत होती. सालों तक स्वतंत्रता सेनानियों पर जुल्म ढाने वाली अफसरशाही ने आजाद होते ही राजनीति को प्रलोभन देने शुरू कर दिए कि कहीं नेता उनसे बदला न लें. ये प्रलोभन बाद में करप्शन में बदल गए. गांधी होते तो देश करप्ट नहीं होता. वो देश को सैद्धांतिक राजनीति में पाग कर जाते. कपूर कमीशन की रिपोर्ट ने भी गांधी की हत्या में हिंदूवादियों का ही हाथ बताया था.

5. नमक सत्याग्रह का विरोध
आरएसएस द्वारा प्रकाशित की गई हेडगेवार की जीवनी के मुताबिक, जब गांधी ने 1930 में अपना नमक सत्याग्रह शुरू किया, तब उन्होंने (हेडगेवार ने) ‘हर जगह यह सूचना भेजी कि संघ इस सत्याग्रह में शामिल नहीं होगा. हालांकि, जो लोग व्यक्तिगत तौर पर इसमें शामिल होना चाहते हैं, उनके लिए ऐसा करने से कोई रोक नहीं है. इसका मतलब यह था कि संघ का कोई भी जिम्मेदार कार्यकर्ता इस सत्याग्रह में शामिल नहीं हो सकता था’.
वैसे तो, संघ के कार्यकर्ताओं में इस ऐतिहासिक घटना में शामिल होने के लिए उत्साह की कमी नहीं थी, लेकिन हेडगेवार ने सक्रिय रूप से इस उत्साह पर पानी डालने का काम किया.

6. भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध
भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के डेढ़ साल बाद, ब्रिटिश राज की बॉम्बे सरकार ने एक मेमो में बेहद संतुष्टि के साथ नोट किया कि ‘संघ ने पूरी ईमानदारी के साथ खुद को कानून के दायरे में रखा है. खासतौर पर अगस्त, 1942 में भड़की अशांति में यह शामिल नहीं हुआ है.’
आरएसएस नेतृत्व के पास आजादी की लड़ाई में शामिल न होने की एक विचित्र वजह थी. जून, 1942 में बंगाल में अंग्रेजों द्वारा निर्मित अकाल, जिसमें कम से कम 30 लाख लोग मारे गए, इस घटना से कुछ महीने पहले दिए गए अपने एक भाषण में गोलवलकर ने कहा था-
'संघ समाज की वर्तमान बदहाली के लिए किसी को भी दोष नहीं देना चाहता. जब लोग दूसरों पर आरोप लगाना शुरू करते हैं तो इसका मतलब होता है कि कमज़ोरी मूल रूप से उनमें ही है. कमज़ोरों के साथ किए गए अन्याय के लिए ताकतवर पर दोष मढ़ना बेकार है. संघ अपना कीमती वक्त दूसरों की आलोचना करने या उनकी बुराई करने में नष्ट नहीं करना चाहता. अगर हमें पता है कि बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है, तो इसके लिए बड़ी मछली को दोष देना पूरी तरह पागलपन है. प्रकृति का नियम, भले ही वह अच्छा हो या खराब, हमेशा सच होता है. इस नियम को अन्यायपूर्ण करार देने से नियम नहीं बदल जाता.'
यहां तक कि मार्च, 1947 में जब अंग्रेज़ों ने आखिरकार एक साल पहले हुए नौसेनिक विद्रोह के बाद भारत छोड़कर जाने का फैसला कर लिया था, गोलवलकर ने आरएसएस के उन कार्यकर्ताओं की आलोचना जारी रखी, जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में हिस्सा लिया था.

7. आजादी के बाद का ‘देशद्रोह’
भारत की आजादी के उपलक्ष्य में आरएसएस के मुखपत्र ‘द ऑर्गेनाइजर’ में प्रकाशित संपादकीय में संघ ने भारत के तिरंगे झंडे का विरोध किया था, और यह घोषणा की थी कि ‘‘हिंदू इस झंडे को न कभी अपनाएंगे, न कभी इसका सम्मान करेंगे.’’ बात को स्पष्ट करते हुए संपादकीय में कहा गया कि ‘‘ये ‘तीन’ शब्द ही अपने आप में अनिष्टकारी है और तीन रंगों वाला झंडा निश्चित तौर पर खराब मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालेगा और यह देश के लिए हानिकारक साबित होगा.’’

Thursday, August 8, 2019

मोदी-शाह ने क्या कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाकर गलत किया?

भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 को हटा दिया है. आम आदमी से लेकर सेलेब्स तक ने इसे एक ऐतिहासिक फैसला बताया. वहीं कश्मीर के कथित रहनुमा कश्मीर के लोगों को यह कहकर बरगलाने की कोशिश करेंगे कि अनुच्छेद 370 हटने से कश्मीरियत खत्म हो जाएगी.समझदार मुसलमान भाइयो और कश्मीरियों के लिए लिख रहा हूं. आमतौर पर हर सिक्के के दो पहलू होते हैं और तुम सिर्फ अभी एक पर फोकस कर रहे हो. कुछ पॉइंट्स में अपनी बात रखता हूं.
1. गोआ को भारत ने 1961 में सिर्फ 2 दिन में आज़ाद कराया. आज कोई दिक्कत है वहां?
2. उसके साथ दमन दीव नागर दादर हवेली भी आज़ाद हुए कोई दिक्कत है वहां?
3. हैदराबाद भी मिलाया गया कोई दिक्कत है वहां? और इन सब जगहों पर पावर का इस्तेमाल किया गया था, मतलब ताक़त से जीता था, क्या उनके साथ कोई अन्याय हुआ?
4. जूनागढ़ वगैरह में भी सब ठीक है और ये आप भी जानते हो.

अब यही कहना है कि कश्मीर के मामले में तो फिर भी संवैधानिक तरीका इस्तेमाल किया गया है. तो क्या गलत करेंगे हम तुम? अब ये भी समझो कि नेपोलियन के बाद जर्मनी में 300 ऐसी ही रियासतें थीं जो एक साथ आई तो जर्मनी सुपर पावर बना और वहां आज भी कोई दिक्कत नही.

मतलब सब ठीक ही है और होगा भी. अब सवाल ये की क्या ये जरूरी था? तो सुनों अगर ऐसा नही होता तो कश्मीर की वो लोकेशन है कि उसको साथ रखना उतना ही जरूरी है जितना बॉर्डर पर बीएसएफ के होना.
दूसरा यू एन ओ में जो तय हुआ था कबायली हमले के बाद में तो वो ये था के दोनों देश सेना हटाये और फिर जनमतसंग्रह यू एन कराएगा. पर पाकिस्तान ने पीओके छोड़ने से इनकार किया. वो फौज नहीं हटेगी तो हम कैसे हट जाते? हमला उनका था 60 परसेंट कश्मीर पीओके बन गया है, कैसे हट जाते? कबायलियों ने जो उस वक़्त नरसंहार किया पीओके में वो दहला देगा पढ़कर देखो.
अब सवाल ये की क्या हम यूएन के जनमतसंग्रह का इंतज़ार करते? किया पूरे 70 साल किया. कश्मीर में किसी राज्य के किसी आदमी को नहीं बसने दिया, पर पाकिस्तान ने क्या किया पीओके की पूरी आबादी का 60 फीसदी पाकिस्तानियों से बदल दिया. अब कैसे होगा जनमतसंग्रह? और कश्मीर में 370 और 35 का फायदा किसे हो रहा था, ऐसा नहीं हो सकता आपको पता न हो.
तो जो हुआ वो बनता है. कश्मीरी पंडित क्यों नहीं टिके जन्नत में, सिर्फ इसलिए कि वो माइनॉरिटी थे वहां और बहुत अमीर थे? रोना सिर्फ कुछ अलगाववादियों का बनता है, और वो रोयेंगे ही. दुकान उनकी लूटी है. पर कुछ लोग इसको ऐसे दिख रहे हैं जैसे इस्लाम खतरे में हो.
आखिरी बात कश्मीर में हमारा काम से कम महाराजा हरि सिंह से कोई विलय का एग्रीमेंट तो था. बलूचिस्तान का क्या? वो मुसलमान नहीं? पाकिस्तान का वह कब्ज़ा और कश्मीर में आज़ादी की लड़ाई? वाह! और पाकिस्तान अगर मुसलमानों का इतना बाद दोस्त है तो वो चीन के उइगेर मुसलमानों की बात क्यों नहीं करता जहां वो दाढ़ी भी नहीं रख सकते, न खुले में नमाज़ पढ़ सकते हैं. सोचना आपको जवाब मिल जाएगा.
(यह मेरा निजी विचार हैं)
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