Sunday, March 6, 2022

जब चौधरी चरण सिंह ने एक झटके में 27 हज़ार पटवारियों का इस्तीफा स्वीकार कर लिया था

पढ़िए उस नेता की कहानी जिसने कभी कोई चुनाव नहीं हारा, जिन्हें किसानों का मसीहा कहा जाता था... बात वर्ष 1952 की है, जब 'जमींदारी उन्‍मूलन विधेयक' पारित किया गया, जिसके कारण उत्तर प्रदेश के पटवारी प्रदर्शन कर रहे थे और 27 हज़ार पटवारियों ने एक साथ इस्तीफा दे दिया था। चौधरी चरण सिंह भी ज़िद्दी स्वभाव के थे उन्होंने किसानों के हितों के सामने किसी की नहीं सुनी। किसानों को पटवारी के आतंक से आजाद दिलाने का श्रेय चरण सिंह को ही जाता है। बाद में उन्‍होंने ही खुद नए पटवारी नियुक्‍त किए, जिन्हें अब लेखपाल कहा जाता है। इसमें 18 परसेंट सीट हरिजनों के लिए रिजर्व थी। 1952 में जब डॉक्टर सम्पूर्णानंद मुख्यमंत्री थे, उस समय चरण सिंह को राजस्व तथा कृषि विभाग का दायित्व मिला। इसी समय उन्होंने करीब 27 हज़ार पटवारियों का इस्तीफा स्वीकार कर लिया था। कभी चुनाव नहीं हारे थे चौधरी चरण सिंह चरण सिंह को 'किसानों का मसीहा' कहा जाता था। उन्‍होंने पूरे उत्तर प्रदेश के किसानों से मिलकर उनकी हरसंभव मदद का प्रयास किया। किसानों के प्रति प्रेम का ही नतीजा था कि उनको किसी भी चुनाव में हार का मुंह नहीं देखना पड़ा। चरण सिंह का जन्म 23 दिसम्बर, 1902 को उत्तर प्रदेश के मेरठ ज़िले के नूरपुर गाँव में एक किसान परिवार में हुआ था। चरण सिंह के राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1937 में हुई जब कांग्रेस की तरफ से उन्‍होंने विधानसभा चुनाव लड़ा और जीता भी। उन्होंने छपरौली विधानसभा सीट से 9 साल तक क्षेत्रीय जनता का कुशलतापूर्वक प्रतिनिधित्व किया। चौधरी चरण सिंह का राजनीतिक भविष्य 1951 में बनना आरम्भ हो गया था, जब इन्हें उत्तर प्रदेश में कैबिनेट मंत्री का पद प्राप्त हुआ। उन्होंने न्याय एवं सूचना विभाग सम्भाला। 1960 में चंद्रभानु गुप्ता की सरकार में उन्हें गृह तथा कृषि मंत्रालय दिया गया और वह उत्तर प्रदेश की जनता के मध्य अत्यन्त लोकप्रिय नेता बन गए। चरण सिंह ने पंडित जवाहर लाल नेहरू से मनमुटाव के चलते सन 1967 में कांग्रेस पार्टी छोड़ दी और एक नए राजनैतिक दल 'भारतीय क्रांति दल' की स्थापना की। राज नारायण और राम मनोहर लोहिया जैसे नेताओं की मदद से उन्होंने उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई और 3 अप्रैल 1967 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 17 अप्रैल 1968 को उन्होंने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। मध्यावधि चुनाव में उन्होंने अच्छी सफलता मिली और दोबारा 17 फ़रवरी 1970 के वे मुख्यमंत्री बने। उसके बाद वो केन्द्र सरकार में गृहमंत्री बने तो उन्होंने मंडल और अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की। 1979 में वित्त मंत्री और उपप्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्रीय कृषि व ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना की। 28 जुलाई 1979 को चौधरी चरण सिंह समाजवादी पार्टियों तथा कांग्रेस (यू) के सहयोग से प्रधानमंत्री बने। चौधरी चरण सिंह एक लेखक चौधरी चरण सिंह एक राजनेता के साथ ही एक कुशल लेखक भी थे और अंग्रेज़ी भाषा पर अच्छी पकड़़ रखते थे। उन्होंने 'अबॉलिशन ऑफ़ ज़मींदारी', 'लिजेण्ड प्रोपराइटरशिप' और 'इंडियास पॉवर्टी एण्ड इट्स सोल्यूशंस' नामक पुस्तकें भी लिखीं।

चौधरी चरण सिंह के साहसिक कार्य, जिनके कारण बने किसानों के मसीहा

चौधरी चरण सिंह के साहसिक कार्य, जिनके कारण बने किसानों के मसीहा

 पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को हापुड़ की बाबूगढ़ छावनी के पास नूरपुर गांव में हुआ था. उनके पिता एक बेहद साधारण किसान थे. चौधरी चरण सिंह ने साल 1926 में मेरठ से कानून में डिग्री (Law degree) ली और गाजियाबाद से वकालत की शुरुआत की. वह अंग्रेजों से देश को आजाद कराने की लड़ाई में जेल भी गए. गौरतलब है कि चौधरी चरण सिंह किसानों के नेता माने जाते रहे हैं, इसलिए उनके द्वारा किए गए कामों के बारे में जान लेते हैं.

 National Farmers Day पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को हापुड़ की बाबूगढ़ छावनी के पास नूरपुर गांव में हुआ था. उनके पिता एक बेहद साधारण किसान थे. चौधरी चरण सिंह ने साल 1926 में मेरठ से कानून में डिग्री (Law degree) ली और गाजियाबाद से वकालत की शुरुआत की. वह अंग्रेजों से देश को आजाद कराने की लड़ाई में जेल भी गए. 
गौरतलब है कि चौधरी चरण सिंह किसानों के नेता माने जाते रहे हैं, इसलिए उनके द्वारा किए गए कामों के बारे में जान लेते हैं. चौधरी चरण सिंह के साहसिक कार्य और घटनाक्रम (Chaudhary Charan Singh's daring task and Events) संविधान बनाने वालों (Constitution maker) को जिन अहम मुद्दों से जूझना पड़ा, उनमें से एक भारत का सामंती सिस्टम था, जिसने देश की आजादी से पहले सामाजिक स्थिति (social status) को बुरी तरह चोट पहुंचाई थी. उस समय जमीन का मालिकाना हक (Land ownership) कुछ ही लोगों के पास था, जबकि बाकी लोगों की जरूरतें भी पूरी नहीं हो पाती थी. इस असमानता को खत्म करने के लिए सरकार कई भूमि सुधार कानून (Land reform bill) लेकर आई, जिसमें से एक जमींदारी उन्मूलन कानून (Zamindari abolition law) 1950 भी था. 

चौधरी साहब 1951 में सूचना एवं न्याय मंत्री (Minister of Information and Justice) बने और तीन महीने बाद ही कृषि मंत्रालय (Ministry of Agriculture) भी उनके अधीन आ गया. सामंतशाही ताकतों ने पटवारियों की शरण ली. फिर से किसानों की जमीन को धोखे से जमींदारों को दिया जाने लगा. इस पर चौधरी चरण सिंह ने उन्हें कड़ी चेतावनी दी जिसके रोष में हजारों पटवारियों ने सामूहिक रूप से इस्तीफे दे दिया. 

सामंतवादी ताकतों को विश्वास था कि सरकार को उनके सामने घुटने टेकने पड़ेंगे, लेकिन चौधरी साहब के दृढ़ निश्चय ने उनका साहस तोड़ दिया. पटवारियों के सभी समूहिक त्याग पत्र (resignation letter) स्वीकार कर उनके स्थान पर लेखपालों की भर्ती कर दी गई. एक जुलाई 1952 को यूपी में उनकी बदौलत जमींदारी प्रथा का उन्मूलन जमींदारी उन्मूलन विधेयक द्वारा किया गया. जिससे किसानों और गरीबों को उनका अधिकार मिला. इसके बाद 1954 में योजना आयोग (Planning Commission) ने आदेश जारी किया कि जिन जमींदारों के पास खुद खेती के लिए जमीन नहीं है, उनको 30 से 60 फीसदी भूमि लेने का अधिकार है. चौधरी साहब ने इसमें भी हस्तक्षेप (Interference) किया और ये कानून उत्तर प्रदेश में लागू नहीं हुआ. मगर अन्य प्रदेशों में योजना आयोग के इस आदेश की आड़ में गरीब किसानों से भूमि छीन ली गई. इसके बाद 1956 में चौधरी चरण सिंह ने जमींदारी उन्मूलन एक्ट (Zamindari Abolition Act) में यह संशोधन किया गया कि कोई भी किसान भूमि से वंचित नहीं किया जाए, जिसका किसी भी रूप में जमीन पर कब्जा हो. ये ऐसा साहसी कार्य था जिसकी सराहना देश में ही नहीं बल्कि विदेशों तक में की गई थी. गरीब किसानों को जमींदारों के शोषण से मुक्ति दिलाकर उन्हें भूमिधर बनाने वाला यह कानून बनाया. 3 अप्रैल 1967 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. उसके बाद चौधरी चरण साहब केन्द्र सरकार में गृहमंत्री बने तो उन्होंने मंडल और अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की. 1979 में वित्त मंत्री और उपप्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्रीय कृषि व ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) की स्थापना की. नाबार्ड वहीं संगठन है जो कृषि क्षेत्र के विकास में बैंक की बड़ी भूमिका निभाता है. 

चौधरी चरण सिंह ने जुलाई 1979 से जनवरी 1980 तक भारत के प्रधानमंत्री के रूप में काम किया. चूंकि भूमि राज्य का विषय है, इसलिए अधिकतर राज्यों ने जमींदारों को भूमि के एक हिस्से पर खेती करने और उसे अपने पास रखने की इजाजत दी, मगर जमींदारों ने इसका भी फायदा उठाया और भूमि पर खुद खेती करनी शुरू कर दी ताकि राज्य सरकार उनसे जमीन वापस न मांग सके. बाद में आर्टिकल 31(a), 31(b) और नौंवा शेड्यूल संविधान में जोड़े गए, इन आर्टिकल्स से जमींदारों को कानूनी सलाह लेने से रोका गया और सरकार के संसोधित कानूनों को चुनौती देने से भी रोका गया, साथ ही राज्य सरकारों को कानून बनाने या किसी की संपत्ति या जमीन का कब्जा करने का अधिकार भी मिल गया. जमींदारी उन्मूलन कानून से पहली बार बेगारी या बंधुआ मजदूरी को कानूनन अपराध के दायरे में लाया गया. उन्होंने सहकारी कृषि एवं जमींदारी उन्मूलन पर पुस्तकें भी लिखीं, जिनकी सराहना दुनिया भर में की गई और की जा रही है. भारत सरकार (Govt of India) द्वारा साल 2001 में 23 दिसंबर को चौधरी चरण सिंह के जन्म दिवस पर राष्ट्रीय किसान दिवस (National Farmers Day) मनाने का फैसला किया गया.


Saturday, March 5, 2022

बीजेपी में क्यों है हार का डर, ये हैं 6 बड़े कारण

बीजेपी में क्यों है हार का डर, ये हैं 6 बड़े कारण

उत्तरप्रदेश में साल (2022) के विधानसभा चुनाव होरहे हैं। इस चुनाव को लगातार दिलचस्प बना रहे हैं सपा प्रमुख अखिलेश यादव । अखिलेश यादव की सक्रियता यूपी में देखने लायक है। भाजपा सत्ता वापसी के लिए बेचैन नजर आने लगी हैं। मौजूदा हालात को देखते हुए यही कयास हैं कि बीजेपी की हार सुनिश्चित है।
संभवतः योगी आदित्यनाथ सत्ता से बाहर होना तय है। इस चुनाव से पहले बीजेपी राम मंदिर मुद्दे को भी खत्म कर चुकी है। जनसंख्या नियंत्रण कानून पर भी चर्चा शुरू हो चुकी है। उसके बावजूद बीजेपी अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नहीं बताई जाती। उसकी कुछ ये बड़ी वजह नजर आती हैं...

पूर्वांचल में पुराने साथियों का छूटना
2017 के विधानसभा चुनाव में पूर्वांचल फतह करने के लिए बीजेपी एक नए फॉर्मूले के साथ मैदान में उतरी थी। बीजेपी ने 2017 के विधानसभा चुनाव में उन छोटे राजनीतिक दलों के साथ में गठबंधन किया, जिनका अपना जातिगत वोटबैंक है। इसी फॉर्मूले का फायदा बीजेपी को मिला और बीजेपी को 2017 के विधानसभा चुनाव में 28 जिलों की 170 सीटों में से 115 सीटें मिली थीं। यह नंबर सच में करिश्माई थे। लेकिन, इस आंकड़े को अकेले बीजेपी ने अपने दम पर हासिल नहीं किया था। उसकी मदद इन छोटे राजनीतिक दलों से जुड़े उनके जातिगत वोटबैंक ने की थी। आइये समझते है पूर्वांचल में इन छोटे राजनीतिक दलों की ताकत जो किसी का भी खेल बना और बिगाड़ सकते हैं। सपा का गठबंधन दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है कुछ ऐसा ही हाल अखिलेश यादव का है। 2019 में बसपा का साथ लेकर सपा को जो नुकसान हुआ था।
उसके बाद अब अखिलेश 2022 के लिए छोटे छोटे दलों के साथ गठबंधन किया हैं। सपा ने राष्ट्रीय लोकदल, संजय चौहान की जनतावादी पार्टी और केशव मौर्या की महान दल के साथ में गठबंधन कर लिया है। बनारस, मथुरा, अयोध्या में सपा की बल्ले-बल्ले जिला पंचायत चुनाव में भले ही बीजेपी ने बाजी मारी हो। पर कुछ नतीजे बीजेपी के लिए भी चौंकाने वाले थे। क्योंकि पार्टी को उन जगहों पर झटका लगा था जहां बिलकुल उम्मीद नहीं थी। अयोध्या में मंदिर मसला हल होने का फायदा जिला पंचायत चुनाव के नतीजों में नजर नहीं आया। यहां समाजवादी पार्टी का दबदबा दिखाई दिया। कमोबेश यही नतीजे बनारस और मथुरा में नजर आए। बता दें बनारस पीएम नरेंद्र मोदी की लोकसभा सीट है।

किसान आंदोलन देश में किसान पिछले 8 महीनों से आंदोलन कर रहे हैं। इस आंदोलन का असर उत्तर प्रदेश की सियासत पर देखने को मिल रहा है। किसान आंदोलन का सबसे अधिक असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को जाट लैंड कहा जाता है, यहां पर एक कहावत कही जाती है कि 'जिसका जाट उसके ठाठ'। इसकी एक वजह यह है कि चौधराहट करने वाले इस समाज के निर्णय से कई जातियों का रुख तय होता है। किसान आंदोलन से यही जाट बीजेपी से खिसक चुके हैं। ब्राह्मणों की नाराजगी साल 2017 में बीजेपी ने पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की तो राजपूत समुदाय से आने वाले योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। यही वजह है कि योगी सरकार में राजपूत बनाम ब्राह्मण के विपक्ष के नैरेटिव के मद्देनजर ब्राह्मण वोटों का अपने पाले में जोड़ने के लिए बसपा से लेकर सपा और कांग्रेस तक सक्रिय है। विकास दुबे और उसके साथि‍यों के एनकाउंटर के बाद बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने उत्तर प्रदेश में योगी अदित्यनाथ की सरकार में ब्राह्मणों पर अत्याचार बढ़ने का आरोप लगाया था। ब्राह्मण बुद्धिजीवियों का आरोप है कि एकतरफा समर्थन के बावजूद सरकार में ब्राह्मणों को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से किनारे कर दिया गया है।

मोदी बनाम योगी!
मोदी और योगी के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। उत्तर प्रदेश की राजनीतिक गलियारों में मोदी बनाम योगी को लेकर काफी चर्चाएं हैं। इन चर्चाओं ने ऐसे ही जन्म नहीं लिया है, इनके पीछे कुछ ठोस वजह हैं। हालांकि बीजेपी ने हर बार यही जाहिर किया है कि पार्टी के अंदर ऐसी कोई कलह नहीं है।

Tuesday, June 23, 2020

मोबाइल से खत्म होता बचपन

आजकल के दौर में अक्सर अधेड़ या बुज़ुर्ग अपने बचपन के किस्से बड़े अच्छे से सुनाते है कि हमने यह किया है वो किया है, लेकिन आजकल ज़्यादातर बच्चे कभी भी अपने बच्चों या आने वाली पीढ़ियों को यह नहीं सुना पाएंगे कि हमने कंचे खेले है, गुल्ली- डंडा खेला है या फिर क्रिकेट फुटबॉल खेला है, क्योंकि जिस तरीके से हम खुद को मॉडर्न समझते है लेकिन मॉडर्न बिल्कुल भी नहीं है बल्कि हम आरामतलब इतने ज़्यादा बन चुके है जब बच्चा एक या दो साल की उम्र में होता है तो वो रोता है हम झट से मोबाइल निकालकर उसके सामने रख देते है या फिर उसको यूट्यूब पर कुछ दिखा देते है जिसको वो देखकर, सुनकर चुप हो जाता है फिर उसकी माँ को उसको दूध नहीं पिलाना पड़ता है जिससे सही मायनों में उस वक़्त माँ उसकी पेट की भूख की जगह दिमाग को शांत करके खत्म कर देती है जिससे बच्चा भूखा ही रह जाता है। उसका ध्यान पेट की जगह गेम या फिर मोबाइल पर चला जाता है और उसका शारीरिक विकास रुक जाता है। ऐसे ही धीरे-धीरे उस बच्चे की आदत बन जाती है और बीमारियां उसको घेरने लगती है इसकी पूरी जिम्मेदारी माँ-बाप की है हालांकि ज़्यादा ज़िम्मेदारी मां की ही है क्योंकि वही अपने बच्चे की भाषा को ज़्यादा समझती है पिता तो काम या फिर रोज़ी रोज़गार के लिए बाहर निकल जाता है। 

जब बच्चा तीन से पांच साल तक कि उम्र में आता है तो वो मोबाइल, लैपटॉप, टेबलेट पर गेम देखना शुरू कर देता है या फिर यूट्यूब के ज़रिए खेलने लगता है। जिसमे कुछ गेम ऐसे है जिसके कारण बहुत तेज़ी से बच्चों के दिमाग को गिरफ्त में ले लेते है और उनका दिमाग केवल गेम में ही रहता है और वो आत्महत्या जैसे कदम भी उठा लेते है जैसे ब्लूव्हेल वाले गेम में हुआ था अनेक बच्चों ने आत्महत्या कर ली थी, उससे भी पहले देखे तो टी.वी सिरियल शक्तिमान के कारण भी ना जाने कितने बच्चों ने छत से छलाँग लगा दी और सोचा कि शक्तिमान उनको बचाने आएगा क्योंकि उन्होंने टीवी सीरियल में देखा है कि जब कहीं पर बच्चों को दिक्कत होती है वो शक्तिमान को याद करते है वो उसको बचाने आ जाता है। दरअसल हम कह सकते है कि बचपन का ज़हन बहुत साफ शफ्फाक होता है जिसको जैसे माहौल में ढालेंगे वो वैसे ही माहौल में खुद को बनाएगा....

मौजूदा दौर में जो मोबाइल गेम चल रहे है वो भी आजकल बच्चों की मानसिकता बदलने उनको क्रूर, निर्दयी, ज़ालिम बनाने में एक अहम किरदार अदा कर रहे हैं क्योंकि उसमें शिक्षा ही मारने पीटने की दी जा रही है जैसे पब्जी, फ्रीफायर, एलियन, बाहुबली, लास्ट कमांडो, न्यू पब्जी और मैनक्राफ्ट जैसे मोबाइल गेम बच्चों को नफसियाती तौर पर ज़ालिम बना रहा है क्योंकि इन गेमों में केवल मारने, घेरने, हथियार चलाने की ही डिजिटल शिक्षा दी जाती है उससे बचपन तो छीनता ही है, दिमाग भी ज़ालिमाना हरकतों की तरफ सोचता और आगे बढ़ता है, यह सच है हमें बच्चों को क्रिएटिव, इनोवेटर बनाना चाहिए उनकी सोचने की शक्ति बढ़ाना चाहिए लेकिन इन गेमों ने उनका बचपन ही छीन लिया उनकी सोचने समझने की शक्ति ही खत्म कर दी वो किसी भी बात पर जो उनको अच्छी ना लगे फौरन जवाब देते है जो कि हमारे संस्कारो के लिए अच्छा नहीं है। 

दूसरी तरफ, टिकटोक, लईकी, हीरो, विगो जैसे एप्प से भी बच्चों के ज़हन में गंदगी भर रही है क्योंकि ज्यादातर उसका कंटेंट ग़लत ही होता है जिससे बच्चे वैसा ही व्यवहार अपने घर के बड़े लोगो से करते है जिससे निश्चित ही उनका मनोविकार होता है और उनमें सहने की क्षमता खत्म होती है जो भावी पीढ़ियों के लिए सही नहीं है सरकार को सोचना चाहिए वो ऐसे गेम और गंदे कंटेंट जल्दी से हटाए और माँ-बाप बच्चों के हाथ से मोबाइल, टेबलेट वापस ले उनको ज़रूरत भर इस्तेमाल करने दे जिससे उनका मानसिक विकास हो, संस्कारवान बने और उनकी आंखों की हिफाज़त हो सके। 

इन गेम और वीडियो की वजह से सबसे ज़्यादा बच्चों की आंखों पर फ़र्क़ पड़ रहा है उनकी आंखें लाल रहती है सुबह उठते ही आंखों में कीचड़ होते है, आंखों की रौशनी कम हो रही है अगर बचपन मे ही आंखों की रोशनी चली जायेगी तो फिर आगे ज़िन्दगी कैसे गुज़रेगी इसको हमे सोचना पड़ेगा बच्चों के सर्वागीण विकास को करने के लिए हमें उनको सही डायरेक्शन में ले जाना होगा जिससे उनका बचपन बचाया जा सके.

अबसे कम से कम 20 साल पहले दादी, नानी, या जो घर के बुज़ुर्ग होते थे वो रात या शाम को सोते वक्त धार्मिक (रिलीजियस), सामाजिक  कहानियां सुनाकर बच्चों का मानसिक विकास करतीं थीं जिससे उनकी तरबियत होती थी आजकल के बच्चे हाथ में मोबाइल लेकर ही सो जाते है जैसे ही आंख खोलते है तो उनके हाथ में मोबाइल ही होता है। 

इस कंपटीटिव दुनिया में हमें बच्चों को मॉडर्न तो ज़हनी तौर से बनाना है लेकिन उनको अपनी तहज़ीब भी सिखानी है, दुनिया के साथ चलना भी सिखाना है ... .इंसान बनाने की जद्दोजहद में लग जाना चाहिए जिससे वो दुनिया और इंसानियत के लिए फायदेमंद हो सके। 

Thursday, May 28, 2020

China ki sajis corona वुहान की महामारी एक सोची समझी साजिश थी कैसे वुहान अचानक घातक वायरस से मुक्त हुआ?

👉दृश्य 1 :
पर्दा खुलता है: चीन बीमार हो जाता है, एक "संकट" में प्रवेश करता है और अपने व्यापार को पंगु बना देता है। पर्दा बंद हो जाता है।

👉दृश्य 2
पर्दा खुलता है: चीनी मुद्रा का अवमूल्यन होता है। वे कुछ नहीं करते। पर्दा बंद हो जाता है।

👉दृश्य 3
पर्दा खुलता है: यूरोप और अमरीका की कंपनियों के व्यापार में कमी के कारण इन कंपनियों के शेयरों के भाव गिर जाते है उनके मूल्य के 40% तक, जो चीन में स्थित हैं चीन कुछ नहीं करता है

👉दृश्य 4
पर्दा खुलता है: दुनिया बीमार है, चीन यूरोप और अमेरिका की कंपनियों के शेयर 30% से भी कम कीमत पर खरीद लेता है। जब दुनिया में इस बीमारी के कारण सारे व्यापार धंधे बंद पड़ जाते है, पर्दा बंद हो जाता है।

👉दृश्य 5
पर्दा खुलता है: चीन ने इस बीमारी को नियंत्रित कर लिया है और अब वह यूरोप और अमेरिका में कंपनियों का मालिक है। क्योंकि यहां व्यापार धंधे ध्वस्त हो चुके हैं और वह यह तय करता है कि ये कंपनियां चीन में रहें और $20,000 बिलियन कमाएं। पर्दा बंद हो जाता है। नाटक इसे कहा जाता है?

👉दृश्य 6
शह और मात
फिर से देखना लेकिन सच है
कल और आज के बीच दो वीडियो जारी हुए हैं, जिनसे मुझे कुछ संदेह हुआ, कोई जरूरी नहीं हो सकता हो यह सिर्फ मेरी अटकल हो। पर मुझे विश्वास है कि कोरोनो वायरस का जानबूझकर स्वयं चीन द्वारा फैलाया गया था। वो पहले से ही तैयार थे इस नाटक के शुरू होने के तीन हफ्ते में ही उन्होंने 12,000 बिस्तर वाले अस्पताल पहले से ही बनवा लिए कैसे? क्या वास्तव में उन्होंने इनका निर्माण दो सप्ताह में किया हो ही नहीं सकता वो उनका निर्माण पहले से ही कर चुके थे क्योंकि ये सब एक योजना का हिस्सा था।
उन्होंने घोषणा की कि उन्होंने महामारी को रोक दिया है। वे जश्न मनाते हुए वीडियो में दिखाई देते हैं, वे घोषणा करते हैं कि उनके पास एक टीका भी है। सभी आनुवंशिक जानकारी के बिना वे इसे इतनी जल्दी कैसे बना सकते हैं? पर यदि आप खुद ही इस नाटक के निर्माता हो तो यह बिल्कुल मुश्किल भी नहीं है। और आज मैंने सिर्फ एक वीडियो देखा जो बताता है कि कैसे जिन पिंग जो दुनिया के शक्तिशाली देश का राष्ट्रपति है उसने पूरी दुनिया को बगैर किसी युद्ध के घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया कोरोना वायरस के कारण, चीन में पश्चिमी देशों की कंपनियों का कारोबार नाटकीय रूप से गिर गया जब दुनिया भर के स्टॉक एक्सचेंजों में इन कंपनियों के शेयर के भाव गिर गए तो उन्हें चीनियों द्वारा खरीद लिया गया। अब चीन, अमेरिका और यूरोप में इन्हीं एक्सचेंजों और अपनी पूंजी द्वारा यह डिसाइड करेगा कि बाज़ार का रुख केसा होगा, औेर कीमतों को निर्धारित करने में सक्षम होगा पश्चिम को अपनी जरूरत की हर चीज बेचने के लिए। क्या गजब की योजना?
हाँ इसमें संयोग से कुछ बूढ़े मर गए? कम उम्र के लोग भी मारे गए पर ना तो चीन को इसकी परवाह है और ना ही कोई बड़ी समस्या वो इनके परिजनों को थोड़े समय मुआवजे के रूप में पेंशन दे देगा, पर इसके एवज उसने कितनी बड़ी लूट की है। और अभी पश्चिम आर्थिक रूप से पराजित है, संकट में और बीमारी से स्तब्ध। और बिना कुछ जाने की यह सब एक योजना का हिस्सा है और बहुत ही सोच समझ कर बनाई गई परफेक्ट योजना।

👉अब चीन 1.18 ट्रिलियन होल्डिंग वाले जापान के बाद अमेरिकी खजाने के सबसे बड़े मालिक है।
अब देखिए इस नाटक के दूसरे किरदारों का रोल केसे रूस और उत्तर कोरिया में करोना नामक घातक बीमारी के केस इतने कम है जबकि वे तो चीन के सहयोगी है उनके आपस में आवाजाही भी ज्यादा है फिर भी कैसे उनके यहां करोना ने वैसा विकराल रूप नहीं दिखाया जैसा की अन्य अमेरिकी और यूरोपीय देशों में देखने को मिला

क्या इसलिए कि वे चीन के कट्टर सहयोगी हैं
दूसरी ओर संयुक्त राज्य अमेरिका/दक्षिण कोरिया/यूनाइटेड किंगडम/फ्रांस/इटली/स्पेन और एशिया गंभीर रूप से प्रभावित हैं

👉वुहान की महामारी एक सोची समझी साजिश थी कैसे वुहान अचानक घातक वायरस से मुक्त हुआ?

चीन का कहना है कि उसके द्वारा उठाए गए कठोर उपाय के कारण वुहान करोना मुक्त हो गया कैसे वो कौन से उपाय थे चीन ने उनका खुलासा नहीं किया चलिए हम इसको इस तरह से देखते है कि वुहान ही क्यों जो वायरस पूरी दुनिया में फेल गया वो वायरस चीन के दूसरे हिस्सों में क्यों नहीं फैला बीजिंग जो कि चीन की राजधानी थी वह इसका कोई भी असर देखने को क्यों नहीं मिला क्या एक संक्रमित बीजिंग तक नहीं पहुंचा जबकि पूरी दुनिया में संक्रमण फेल चुका है या फिर इस नाटक को सिर्फ वुहान के लिए रचा गया था क्या एक भी संक्रमित व्यक्ति ने नवम्बर से लेकर जनवरी तक वुहान से चीन के अन्य हिस्सों में यात्रा नहीं की जबकि इसके उलट ये संक्रमित दुनिया के लगभग हर कोने में पहुंच गए वो भी अच्छी खासी तादाद में केसे? क्यों?

बीजिंग में करोना से एक व्यक्ति नहीं मारा गया? और सिर्फ वुहान में हजारों
यह विचार करना और दिलचस्प है, की अब कैसे चीन ने इस पर काबू पा लिया उन्होंने इसका क्या इलाज किया और फिर अब उसे व्यापार के लिए खोल भी दिया आखिर कैसे जबकि दुनिया भर के डाक्टर इसका इलाज ढूंढ रहे हैं तो चीनियों ने केसे ये चमत्कार कर लिया
खैर
👉करोना को हमें व्यापार युद्ध में यूएसए द्वारा चीन की बांह मोड़ने की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए
👉अमेरिका और उपर्युक्त सभी देश आर्थिक रूप से तबाह हैं
जल्द ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था चीन की योजना के अनुसार ढह जाएगी।
चीन जानता है कि वह अमेरिका को सैन्य रूप से नहीं हरा सकता क्योंकि अमरीका वर्तमान में दुनिया में सबसे शक्तिशाली देश है।
तो उसने यहां वाइरस का उपयोग किया जो कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था और रक्षा क्षमताओं को पंगु बना दें।
राष्ट्रपति ट्रम्प हमेशा से यह बताते रहे हैं कि कैसे अमेरिकी अर्थव्यवस्था सभी मोर्चों पर सुधार कर रही थी और नौकरियां संयुक्त राज्य अमेरिका में वापस आ रही थीं।
AMERICA GREAT AGAIN बनाने की उनकी दृष्टि को नष्ट करने का एकमात्र तरीका एक ECONOMIC HAVOC है।
चीन  मिलकर एक वायरस जारी करके ट्रम्प को नष्ट कर दिया जाए।
👉वुहान की महामारी एक सोची समझी साजिश थी।
आप ही सोचिए महामारी के चरम पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग उन प्रभावी क्षेत्रों का दौरा करने के लिए जाते वक़्त बस एक साधारण आरएम 1 फेसमास्क पहने हुए थे जबकि इटली में इस महामारी का इलाज कर रहे डाक्टर पूरी तरह कवर होने और सावधानी बरतने के बाद भी संक्रमित हो रहे है
राष्ट्रपति के रूप में उन्हें सिर से पैर तक ढंका जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं था क्यों? क्या इसीलिए की इस महामारी से होने वाले किसी भी प्रकार के नुकसान से बचने के लिए उन्होंने पहले से ही कोई टीका लगा रखा था इसका मतलब है की इस महामारी का इलाज पहले ही ढूंढ लिया गया था बाद में इस वायरस को फैलाया गया है शायद यह सब चीन की योजना थी

👉अब ECONOMIC COLLAPSE के कगार पर बैठे देशों से अधिकतर शेयर स्टॉक खरीदने के बाद विश्व अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने की बाद में चीन यह घोषणा करेगा कि उनके मेडिकल शोधकर्ताओं ने वायरस को नष्ट करने का इलाज ढूंढ लिया है और इस तरह इस नाटक की समाप्ति की घोषणा हो जाएगी और बिना किसी युद्ध के चीन ने अपना साम्राज्य पूरी दुनिया में फैला दिया अब वह अपने देश में बैठे बैठे ही किसी भी देश की अर्थवयवस्था को हिला सकता है जैसा की अभी भारत ने मलेशिया के साथ किया था जब मलेशिया के राष्ट्रपति ने धारा 370 के खिलाफ बयान दिए थे उसके बाद भारत ने वहा के बाजार को हिलाकर रख दिया ऐसा ही अब चीन भी अपने सभी पश्चिमी गठबंधनों के साथ मिलकर विश्व की अलग देशों की अर्थव्यवस्था के साथ करेगा, और ये देश बहुत जल्द ही अपने नए मास्टर चीन के गुलाम हो जाएंगे भविष्य का युद्ध हथियारों से नहीं व्यापार से शेयर स्टॉक से लड़ा जाएगा और चीन ने इस विश्व युद्ध की शुरुआत कर दी है आपको हमें और देश को समझना होगा कि इस तरह के युद्ध में हमारी रणनीति क्या हो।

👉वुहान से शंघाई = 839 km
👉वुहान से बीजिंग = 1152 km
👉वुहान से मिलान = 15000 km
👉वुहान से न्यूयॉर्क = 15000 km
👉वुहान से ईटली= 8695km
👉वुहान से भारत= 3695 km
👉वुहान से ईरान = 5667 km
👉पास के बीजिंग/शंघाई में कोरोना का कोई प्रभाव नहीं
लेकिन इटली,ईरान,यूरोप देशों में लोगों की मृत्यु और पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था बर्बाद
चीन के सभी व्यापारिक क्षेत्र सुरक्षित
कुछ तो गड़बड़ है।